नहीं योग्यता चाहिए, ऐसा सेवा धर्म।
बढियाँ है नेतागिरी, पूर्ण समय का कर्म।।
कुर्सी चालीसा पढ़े, ज्ञानी बहुजन आज।
जनता की सुनते नहीं, भानरहित है काज।।
जब चुनाव है सामने, सजता है बाज़ार।
झूठे वादे दे सदा, करता सरिता पार।।
कंधों पर चढ़ बांकुरे, बन जन प्रतिनिधि आज।
उन्ही जन की बेबसी, खोले दिल के राज।
नेताओं की सात ही, पुश्ते मालामाल।
जन गण रोएं रात में, पोंछे अपने गाल।।
झूठ पुलिन्दा देख लो, ठग है जुमलेबाज।
जनता को भरमा रहे, दिखा फलक पर ताज।।
पांच साल की चाकरी, लक्ष्मी दे वरदान।
चारों खाने चित्त है, आम आदमी जान।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।