तो फिर वह कौन था...
सोलह शृंगार कर अपने साजन से मिलने व्याकुल कामिनी नदिया तट पर कौशल का इंतजार कर रही थी।
कौशल उसका पडोसी है। बचपन से प्रिय दोस्त। यौवन की दहलीज पार करते दोनों एक दूसरे को कब चाहने लगे, पता ही न चला। आज पूर्णिमा के दिन दोनों एक दूजे का हाथ जीवन भर थामने का वादा करने वाले थे। सुंदर सी घडी अपने कौशल को देगी वह। मन ही मन उसका मुस्कुराता चेहरा याद कर वह शरमा रही थी।
उसके पसंद की सुर्ख गुलाबी साडी, उसने उपहार स्वरूप दिये बडे-बडे झुमके। रूपसी अप्सरा सा खिला था रूप उसका। जैसे ही वह इधर-उधर नजरें घुमाती, झुमके गालों को हल्के से छूते, जैसे कह रहे हो, आ रहा है कौशल।
उसकी बाहों में सिमटने को मन उतावला हो रहा था। मिलन की आस में धडकन तेज हो रही थी। धक-धक करता दिल जैसे साजन को पुकार रहा हो।
आज वह सिंदूरी शाम कुछ अलग ही थी।
कितनी देर हो गई राह तकते-तकते। कौशल अब तक नहीं आया। आज तो मैं बहुत देर तक रूठी रहूंगी। कौशल चाहे कितना भी मना ले, मानूंगी नहीं।
सिंदूरी शाम अब विदा ले रही थी।
रात रानी धीरे-धीरे अपना साम्राज्य फैला रही थी। वह बैठी रही। उंगलियां रेत में कुरेदते दोनों का नाम लिखने में व्यस्त थी।
'कामिनी कौशल' वह अपने आशियाने का भी यही नाम रखेगी। भीड-भाड भरा नदी तट धीरे-धीरे सुनसान हो रहा था। अचानक उसे लगा किसी ने पीछे से आकर उसकी आंखों पर अपनी हथेलियां रख दी हो और पूछ रहा है, कौन हूं मैं?
एक पल के लिए वह डर सी गई।
"कौशल, क्या मजाक है? कितनी देर कर दी?"
"कब से अकेली बैठी हूं।"
"जाओ, मैं तुम से बात नहीं करूंगी।"
" प्रिये, ऐसी भी क्या नाराजगी?"
" बडी मुश्किल से आये है हम अपनी मेहबूबा से मिलने।"
" लेकिन इतनी देर? कहा था न तुमने सिंदूरी शाम की साक्षी से हम एक दूजे को साथ रहने का वचन देंगे।"
" झूठे हो तुम।"
"देखो, सिंदूर की डिबिया हमें चिढा रही है।"
" आंखों से हाथ तो हटाओ।"
जैसे ही उसने पीछे मुडकर देखा, कोई नहीं था वहां।
फोन बज रहा था। बदहवास सी वह फोन को देख रही थी। घंटी लगातार बज रही थी। डरी-सहमी सी वह थरथर काँप रही थी।
माँ का फोन था।
"कहां हो तुम? जल्दी से घर आओ।"
भागती हुई वह मंदिर के पास खडे रिक्षा में सवार हुई।
कौन था वह। कौशल सी ही आवाज..
पहेली सुलझाने की कोशिश कर ही रही थी कि घर आ गया।
पडोसी कौशल के घर के सामने भीड थी।
"बेचारा। प्रियतमा से मिलने जा रहा था। मुठ्ठी में भींचा हैं प्रेमपत्र।"
" बेचारी, कौन होगी, अब तक इंतजार कर रही होगी।"
माँ को देख वह दौड़कर उनसे लिपट गई।
कौशल की बाईक फिसल गई थी और वह ट्रक की चपेट में आ गया था। मौके पर ही दम तोड दिया था उसने।
तो फिर वह वह कौन था?
कामिनी स्तब्ध है।
माँ परेशान। अपनी लाडली को सहला रही है।
सिंदूरी शाम के सपने इधर-उधर बिखरे पडे है।
स्वरचित मौलिक कहानी
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र