कैसे एक एकांत से जन्मा
मिलता है भवसागर से,
जैसे बारिश की बूंद यहां
मिलती है महासागर से!
जुड़ते है अपनों से रिश्ते
बंधन अटूट कहलाते है,
जाने और अंजाने में हम
स्वयं से खो जाते है!
खोने-पाने की चाहत में
जीवन-मर्म भूल जाते है,
कुछ न दिखाई देने पर
स्वयं को याद हम आते है!
एकांत नहीं है अकेलापन
यही तो है बस जीवन-मर्म,
स्वयं से स्वयं की खोज का
मात्र यहीं है अकेला धर्म!
मृत्यु जीवन का अटल सत्य
कहना यह जग जाहिर है,
विलीन होना है एकांत में
बताने में जग माहिर है!
तो क्यों न आज से हम
एकांत से रिश्ता जोड़ लें,
बंधन भरे इस संसार के
दुख से नाता तोड़ दे!
माया रूपी इस नगरी में
सब कुछ बस एक सपना है,
मानो या न मानो फिर भी
‘एकांत‘ ही बस अपना है।