मन के हारे हार ..

खानदानी घर की मोहिनी देवी पर आफत का अंबार लगा था, एक एक करके  इतनी परेशानी आयी कि वे  रूकने का नाम  ही नहीं लेती,दो बच्चों की माॅं मोहिनी देवी के पति देव रमेश तो कम उम्र में ही चल बसे थे,
एक तरफ दकियानूसी  समाज के ताने और घर में धन का अभाव मोहिनी जाए तो जाए कहाॅं, खानदानी घर,अब घर से कदम बाहर रखे तो लोग ताने देने लग जाते थे ।

करें तो क्या करें, बच्चों को भी बड़ा करना था, सलाह कार तो बहुत आते थे पर मदद गार कोई नहीं था । 

जैसे तैसे घर में ही वड़ी, पापड़, अचार, बना कर बेचती मोहिनी देवी मेहनत मजदूरी करते करते बच्चों को बड़ा कर रही थी,  मोहिनी चिंताग्रस्त रहने लगी ।

दरअसल हुआ यह कि म्युनिसिपल ओफिस से परिपत्र आया था कि मोहिनी देवी का मकान अवैध रूप से बना है और इसे खाली करना पड़ेगा। 
और एक दुकान थी वो जलजले में जमीन दोस्त हो गयी थी , उसका भी कोई ग्राहक नहीं था , क्योंकि उधर एक जमाने में बाजार‌ लगता था   वो बाज़ार  मूल गांव से थोड़ा कहीं  दूर चला गया था ।

बड़ा लड़का दसवीं कक्षा में आ गया था  छोटा आठवीं में। 

मोहिनी ने यह वाक्य, किसी किताब में पढ़ा या पता नहीं कहीं  सत्संग में सुना होगा  कि

 "मन के हारे हार है मन के जीते जीत", फिर उस वाक्य को गांठ से बांध लिया प्रेरणा ली और हिम्मत जुटाई,  अपने आप को संबल व सांत्वना देती रही।
दोनों बेटों का बहुत साथ मिला। मम्मी तुम क्यों फिक्र करती हो हम हैं न , सब ठीक हो जाएगा।  एक दिन मोहिनी को क्या सूझा की यूं बातों से, संबल, सांत्वना से पेट नहीं भरेगा , मुझे कुछ करना चाहिए, यह लाचारी अच्छी नहीं है ,लड़को का घर है कल के दिन धन नहीं होगा तो कोई पास नहीं फटकेगा ,कल के दिन उनकी आगे की पढ़ाई, शादी आदि के खर्च आयेंगे, कहाॅं हाथ पसारेंगे, और किसका अहसास भी लें, मेरे बच्चों को पूरी जिंदगी सुनना पड़ेगा, यह भी तो ठीक नहीं,ऐसे  कैसे व कब तक  चलेगा, लोगों को जो कहना होगा वो कहेंगे । मोहिनी एक सेवा संस्थान से जुड़ गयी जो गांव में पहले से मौजूद थी । (चाहती तो कब की जुड़ जाती, पर वो कहने है न भाग्य और सूझबूझ ,परिश्रम व बौद्धिकता, समर्पण, संघर्ष ये सभी तत्व एक साथ खिलते हैं तभी आदमी पनप पाता है ।)

मोहिनी ने उस संस्थान से कहा कि मुझमें यह हुनर है , मैं आचार ,पापड़ ,बड़ियां, बनाती हूॅं और बहुत ही स्वादिष्ट बनते हैं मेरे हाथ से , मुझे इस काम को बड़े पैमाने पर करना है ।
वो गुजराती में कहते हैं , बोले ऐना बोर वेचाय 
मतलब आप किसी को कहोगे तभी तो कुछ होगा , बिना कहे कैसे पता चले ।
 मोहिनी ने संस्थान के प्रभारियों से गुजारिश की कहो तो मैं इस संस्था के सानिध्य में मैं काम कर सकती हूॅं, संस्थान के प्रभारी सुरजीत बहुत  सुलझे हुए शालीन समझदार व उदार थे , उसने कहा नेकी और पूछ पूछ हमें तो जरूरत है और यह हमारी परियोजना में ही है , आप मैनैजमेंट देख लो और संभालों इस काम को , हम हर संभव सहायता करेंगे। आप अकेले नहीं इस गांव की जिन जिन महिलाओं की आवश्यकता है वे इस संस्था से जुड़े और रोजगार पनपाएं। बस फिर क्या था , एक छोटी सी सोच को बड़ा रूप मिल गया , एक छोटा-सा विचार उसका बीज एक वट वृक्ष की भांति लहलहाने लगा है । आज मोहिनी के पास खुद का घर गाड़ी सब है , क्योंकि इस उद्योग ने बड़ी इन्डस्ट्री का रूप ले लिया है । सही में मैं कहता हूॅं मन के हारे हार है मन के जीते जीत।

स्वरचित: अशोक दोशी 

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