मतगयन्द सवैया!

मत्तगयन्द सवैया: 

तारक है अरिहंत जिनेश्वर ,
भैरव देव करें रखवारी।
साधक आतम काज सुधारक,
भूतल पावन तारणहारी।।

संगम तीरथ तीरण तारण,
संबल-कंबल जो मनु धारी।
शीतल स्नेहिल रूप हरे दुख,
पांच नमो पद उन्नत भारी।

देव जिनेश्वर नाम शुभाशिश,
मानुष जीवन पातक हारी।
साधक बाधक घातक मारक,
जीवन दायक सक्षम नारी।।

शैशव अंतस निर्मल सुन्दर, 
आगत स्वागत केसर क्यारी।
शंकर मंतर से पढ़ आगम,
निश्चय साहस दानव मारी।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • बहुत बढ़िया लिखा है।