समरांगण...

पुष्पमाला छंद 
मापनी २१ २२२ १२
दिनांक : 24-04-2026

शीर्षक : समरांगण

विश्व समरांगण सजा।
शंख रण में है बजा।
शस्त्र हाटों पर बिके।
ओस पलकों पर टिके।।

आह मनु की जग सुने।
चाह मखमल की बुने।
ताप से दिल है जला।
सूर्य अस्ताचल ढला।।

युद्ध को मनु रोक दो।
आग में मत झोक दो।
देख मत बन खुद खुदा।
न्याय रब का है जुदा।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।




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