कैसे कहूं मन की बातें,
शब्दों से परे मुलाकाते!
सुहाने दिन, महकती राते!
वो चाँद का छेड़ना आते-जाते!
कैसे भूलूं वो हसीन वादें,
चांदनी रात में भीगी-भीगी यादें!
होंठ सिले-सिले, वो मीठी फरियादें,
वो साथ जीने-मरने के बेखौफ़ इरादें!
तेरे एक प्रोमिस पर,
वारी-वारी जाऊंगी मैं दुनिया सारी!
ख़ुशी हो या गम, साथ रहेंगे हम,
चाहे दुनिया करें जुल्म-ए-सितम!
स्वरचित और मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई