शीर्षक : शिल्पकार !
वक़्त के चक्के पर दे आकार,
मिट्टी के गोले का सृजनकार,
उज्जवल भविष्य का रच्चणहार,
जीवन-नैया का खेवनहार!
हीरे का पारखी, जौहरी होनहार,
तराशने में माहिर, शिल्पकार !
अंधियारी रातों में जलता दीया!
स्नेह की ज्योति, वात्सल्य हीया!
भटके पथिक का साथी-साया!
सरवर में खिला ब्रह्मकमल मन भाया!
अंतर के स्पंदन का आर्तनाद,
अभिभावक का त्याग, प्यार, संवाद!
जीवन वीणा का कोमल साज,
राष्ट्र का स्वाभिमान, राष्ट्र का नाज़!
भूतकाल की धरोहर, भविष्य का निवेश!
आशीर्वाद की गठरी, उज्जवल परिवेश?
शिक्षकगण, शिक्षाविद्, शिल्पकार,
निर्माता, निर्देशक, नव ज्ञान भंडार!!
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई