साकी! तेरे मयखाने में …
जिंदगी से सुलह कर ली!
रिश्ते-नातों को दफ़न कर ....
तेरी बाँहों में पनाह ले ली!
दुनियाँ के अंधेरों में …
जब साएँ भी दगा दे गएँ ....
साकी! तेरे मयखाने में …
थके-हारे वफ़ा तलाशने आएँ !
मुद्दतों बाद फिर लौटे ,
साकी! तेरी मरमरी बाहों में!
ज़िन्दगी बेवफ़ा सही,
शामिल तू वफादारों में!
मद्दिम रोशनी में ....
झिलमिलाते रंगीन चेहरें ....
छलकते पैमाने पे साकी ....
रंज-ओ-गम के स्याह पहरें !
भूलना चाहते है जिन्हें ....
अक्सर वहीँ नज़र आएंगे
साकी! मय के प्याले में भी ....
यादों को न डूबा पाएंगे!
साकी! तेरी महफ़िल में। …
शमा जलती रहेेगी बेशर्म!!
पतंगे की मौत का …
कौन जानेगा छुपा मर्म?
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा |