जब जब उसे देखता हूँ तो मुझे अंजली की याद आ जाती है, बिल्कुल ऐसी ही तो थी वो, नशीली निली - निली आंखें, घुमावदार घुंघराले काले रंग के बाल, साक्षात उसके जैसी ।
क्या उससे पूछे कि तुम्हारा नाम क्या है? और कहाँ से आईं हो कहीं तुम मेरी अंजली ही तो नहीं? अरे नहीं, नहीं क्या सोच रहे हो आखिर मरने के पश्चात कोई जीवित हो सकता है । मन है, वो कुछ भी सोचता रहता है, उस पर काबू पाना साधारण बात थोड़ी ही है । सोचते हुए उसकी ओर लगातार देखे जा रहा था । शायद मेरी चोरी पकड़ी गई, उसे पता चल गया कि मैं उसकी ओर निहार रहा हूँ ।
ये जानकर ही उसने अपने सहेली को आंखों से इशारा किया तो मैंने उसका उद्देश्य भांपकर अपनी नजरें फेर ली । न जाने क्या सोच रहीं होगी वो मेरे बारे में । मैं अपने काम में लग गया।
कुछ दिन बीत जाने पर उसकी सहेली मेरे घर आईं तो मैं भयभीत हो गया, मेरे मन में चल रहें द्वंद्व और माथे पर आईं शिकन से मेरी चोरी पकड़ी गई ।
आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है दिपक जी.. उसने बड़े साफ लहजे में अपनी बात कही ।
उसके मुख से मेरा नाम जानकर मैं आश्चर्यित हो गया और डरते- डरते कहने लगा, आप मेरा नाम कैसे जानती हो? आप कहीं मेरी जासूसी तो नहीं कर रहे हो?
डरने की कोई बात नहीं है आपको, मैं आपकी पूरी सच्चाई जान गईं हूँ..
कैसी सच्चाई?
यही कि पिछले साल होली के दिन आपने अपनी पत्नी को एक हादसे में खो दिया ।
ये आपको किसने बताया और आप मेरे बारे में क्या क्या जानती हो और क्यों जानना चाहती हो?
मैं आपको पूरी बात समझाती हूँ, " पिछले चार- पाच दिनों से आप लगातार मेरी दोस्त को घूरे जा रहे हो, जो उसे पसन्द नहीं ।तुम्हारे इस बर्ताव के कारण वह रोज- रोज गालियाँ दे रहीं थी लेकिन न जाने क्यों पर एक दिन वह मुझसे बोली कि मुझे उस खिड़की वाले से प्यार हो गया है, चल ना उससे बात करते है । मैंने लाख कोशिश करी कि ऐसे देखकर प्यार नहीं किया जाता, आखिर जानती ही क्या है उसके बारे में, ना उसका नाम ना ही परिवार के बारे में । उसने जिद ना छोड़ी और कहने लगी, देख ना रमिता यानी मैं, इतने दिनों से वह ताड़े जा रहा है किंतु कोई हरकत उसकी ओर से नहीं हो रहीं हैं, इससे समझ आता है कि वह कितना शालीन है, जब मैंने गौर से उसके नेत्रों में देखा तो मुझे अपना प्यार नजर आने लगा, चल ना उसके बारे में जानते हैं , उसके इस हठ के सामने मुझे झुकना पड़ा और हमने तुम्हारे बारे में जानने की कोशिश तेज कर दी । जब हमने जाना कि होली खेलते- खेलते अचानक आपकी पत्नी गुजर गई तो हमारे पैरों तले से जमीन खिसक गई । क्या कभी कोई इन्सान अचानक ऐसे मर सकता है ये हमारे लिए आश्चर्य की बात है । आपकी ये बात हमें जाननी है दिपक जी ।" इतना कहकर वह रूक गई ।
चली जाओ यहाँ से क्या करोगी मेरी सच्चाई जानकर और ये जानकर भी कि मैं एक शादीशुदा आदमी हूँ फिर भी मेरे घर आ गईं, मैं तुम्हें क्यों डांट रहा हूँ मैं यह जानकर भी उस लड़की को देख रहा था कि मैं एक शादीशुदा आदमी हूँ, गलती हो गई मुझसे मुझे हो सके तो माफ कर दिजीएगा.. इतना कहकर मैंने रमिता को चले जाने को कह दिया और दरवाजा बंद कर दिया ।
वहाँ क्या हुआ होगा यही सोचते हुए रमिता का इंतजार करने लगी, कुछ समय बाद जब वह आईं तो उसने वहाँ घटित सारी बातें कहीं तो कहने लगी, अच्छा ये बात है कोई बात नहीं.. इतना कहकर वह बैठी - बैठी कुछ सोचने लगी ।
उसका ये रूप देखकर रमिता को कुछ बुरा लगा, लेकिन वह अपनी दोस्त को जानती थी और शांत बैठी रहीं ।
अगली सुबह जब दोनों दिपक से मिलने गईं, तो घर पर ताला लगा हुआ था । जब मकान मालिक से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह तो घर खाली कर हमेशा- हमेशा के लिए अपने गाँव सीतमपूर चला गया । उसका ये अचानक गाँव चले जाना कुछ अटपटा - सा लगा ।
बिना कुछ सोचे - समझे वह दोनों उसकी खोज के लिए उसके गाँव की तरफ बढ़ गए आखिर पता भी तो चले कि उसने अचानक से यह शहर क्यों छोड़ दिया? उसकी बिवी को मौत कैसे हुईं? क्या उसका मेरी ओर बार- बार देखना किसी भूतपूर्व घटना की ओर संकेत तो नहीं कर रहा था? ऐसी कौनसी बात है जो वह सबसे छुपाना चाहता है? कितने ही सवाल उसके मन में उठ रहे थे जिसका उत्तर केवल दिपक ही दे सकता था । इन सवालों के जवाब ढूँढने के लिए हम दोनों ने उसके गाँव की तरफ कूच किया ।
छह घंटे के लंबे प्रवास के बाद हम उसके गाँव पहुँचे । चारों ओर गेहूँ और गन्ने के हरे भरे खेत - खलिहान ना कोई शोर- शराबा, ना कोई ऊंच नीच का भेदभाव, सब अपने- अपने कामों व्यस्त गाँव का ये जीवन मन को अति शांति प्रदान करता है । इस वातावरण में मिलकर मानो सारी थकान मिट सी गई ।
जितना सोचा था उतनी कठिनाई नहीं हुई उसका घर खोजने और हम उसके घर पर पहुँच गए ।
दरवाजे की घंटी सुनकर कामिनी ने द्वार खोला, और अनजान दोनों लड़कियों से पूछा, आप कौन और आपको कौन चाहिए?
माँ जी, यह दिपक जी का घर है, हम शहर से उन्हें ही मिलने आए हैं, क्या उनसे हमारी मुलाकात हो सकती है?
क्यों नहीं, मैं अभी दिपक को बुलाती हूँ, अंदर आओ, बैठो ।
दोनों अंदर आकर सोफे पर बैठ जाते हैं । कुछ क्षण बाद दिपक अपने कमरे से आता है तो वह बिफर जाता है और अपनी माँ से कहता है, इन्हें अंदर क्यों आने दिया न जान ना पहचान ।
बेटा, इतनी दूर शहर से खास तुमसे ही मिलने आईं हैं वह दोनों ।
माँ जी, रहने दो नहीं मिलना चाहता है तो हम चले जाते हैं, लेकिन एक सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए कि वह मुझे क्यों बार -बार घूरता रहता जब मुझसे बात ही नहीं करनी थी तो, क्या लड़कियां सिर्फ आकर्षण का केंद्र है जिसे जी भरकर देखो और जब जवाब मांगे तो उससे दूर भागा जाए ।
उसके मुंह से जब ये सुना तो माँ जी ने अपने बेटे से सच्चाई जाननी चाही, आखिर माजरा क्या है?
दिपक बुरी तरह फंस चूका था, "इधर जाए तो कुआँ, उधर जाए तो खाईं " । अब उसने सारी बातें बतानी शुरू कि, मेरी और अंजली की शादी हुईं, तो हम दोनों ही खुश थे । क्या क्या सपने सजाये थे हम दोनों ने अपने भविष्य के बारे में । जब एक दिन खबर मिली की अंजली प्रेग्नेंट है तो हमारी खुशियों को चार चाँद लग गए । जब गर्भावस्था के छह - सात महीने थे तभी होली आईं, मेरे मना करने के बावजूद भी वह होली खेलने चलीं गईं और अचानक खेलते हुए वह बेहोश हो गई । जब अस्पताल में पहुँचे तो डाक्टर कहने लगे कि हमने आपकी पत्नी को तो बचा लिया है, मगर होली के रंग उसके पेट में जाने के कारण शायद बच्चे के पेट में पहुँच गए और बच्चे की मौत हो गईं । डाक्टर की ये बातें अंजली ने सुन ली, और स्वयं के ही कारण अपने बच्चे की मौत हुई है ऐसा मानकर उसने अपना गला स्वयं के हाथों से काट लिया । रहीं बात तुम्हें देखने की तो मैंने कभी तुम्हें उस नजर से नहीं देखा जैसे तुम सोचती हो, तुम्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता कि कहीं अंजली का ही अक्स तो मेरे सामने खड़ा नहीं, उसकी मौजूदगी तुम्हें देखकर मुझे प्राप्त हो जाती जब तुम्हारी दोस्त ने कहा कि वह तुमसे प्यार करने लगी है तो मैं सब छोड़कर यहाँ चला आया ।"
उसकी ये कहानी सुनकर हमारे नेत्रों से पानी की बूंदें बरसने लगी, वह कहने लगी जो हुआ वह गलतफहमी में हुआ लेकिन मैं आपकी कमी को पूरा कर सकती हूँ, क्या तुम मुझसे शादी करोगे?
कैसी बहकी - बहकी बातें कर रही हो तुम, वो भी मेरी सच्चाई जानने के बाद ।
सच्चाई जानकर ही तुम्हारे लिए मेरा प्यार और बढ़ गया है, मेरा नाम भी तो अंजली ही है शायद ईश्वर ने ही मेरी शादी रोककर रखीं थी, जो अब तुम्हारे मिलन से पूर्ण होगी ।
क्या कहा तुमने, तुम्हारा नाम अंजली है..
हा, मेरा नाम अंजली ही है.. सच में..
तुम्हारा नाम अंजली होने से क्या होता है, मेरी अंजली की जगह कोई दूसरी नहीं ले सकती, कोई नहीं।
लेकिन मैं तुम्हें चाहने लगी हूँ और तुमसे शादी करना चाहती हूँ।
माँ, ये लड़की पागल हो गई है, उसे यहाँ से दूर कर दो।
दिपक की माँ को ही अब फैसला करना था, बेटा अंजली मैं तुम्हारे माता- पिता से मिलना चाहती हूँ |
जब ये बात सुनी तो वह रोने लगी, तो रमिता कहने लगी ये अनाथ है माँ जी।
क्या, तुम अनाथ हो बेटी, नहीं आज से तुम मेरी बेटी हो और मैं तुम्हारी माँ।
दिपक को अपनी माँ के सामने झुकना पड़ा । दोनों की शादी धूमधाम से कर दी गई ।
मंथन विनायक देवरे " हिम "