जहर घुला शहद...


ये कैसा फलक?

ये कैसा मंज़र?

इंसानियत बिलख रही,

मानवता कराह रही!

मय्यत का सामान,

प्रकृति सजा रही!!

ये कैसी तरक्की,

ये कैसी फतह?

लाशों के अंबार पर,

राजनीति फुदक रही!

सत्ता के गलियारों में,

असर्फिया बंट रही!

ये कैसी व्यवस्था,

ये कैसा इंतजाम?

सांसें उखड़ रही,

मौत बेखौफ है खड़ी!

सौदागरों की मंडियों में,

बोलियां लगी बड़ी बड़ी!

ये कैसी सुविधा,

ये कैसा मुकाम?

दौड़ रही ऑक्सीजन एक्सप्रेस,

थम रही है सांस!

हॉस्पिटलों के आहातों में,

मृत्यु का आभास!

ये कैसा नशा,

ये कैसी तलब!

दवा महंगी, शराब सस्ती,

इंसानियत पे हावी मौकापरस्ती!

कालाबाजारी, सूदखोरी,

महामारी में जिंदगी सस्ती!

ये कैसा आशियाना,

कैसा ठिकाना?

श्मशान अमीरों के हाट,

जहां जारी बंदरबांट!

यहां भी खड़े भाट!

लकीरों को तरसे ललाट!

ये कैसी यारी,

ये कैसा पैगाम?

बुझते दीए की जद्दोजहद,

डरे अपनों से अपने अहद!

कैसी पीड़ा, कैसा दर्द,

मानो जहर में, घुला शहद!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा
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