दोहावली
प्राची से ले लालिमा, आयी हौले भोर।
सृष्टि रूप मोहिनी सा, पंछी करते शोर।।
बरसे बादल जोर से, नाचे वन में मोर।
बूंद बूंद मोती झरे, होवे जिया विभोर।।
डाल डाल जब डोलती, करे पुष्प बौछार।
झूले पेडों पर पडे, चहकी बाग बहार।।
रिमझिम बूंदे बरसती, होता रूप निखार।
ओढे धानी चुनरिया, धरा करे शृंगार।।
कलकल जल धारा बहे, दे जीवन आधार।
मखमल का गलिचा हरा, मन में हर्ष अपार।।
ऊंचे बडे पहाड दे, सदा हमें विश्वास।
वृक्ष हमारे मित्र हैं, जीवन का मधुमास।।
स्वरचित मौलिक रचनाकार
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र