माया-मोह माया-मोह के बन्धन में, सपनों का संसार।
क्रोध-अहम् की आँधी, भड़का रही अंगार।।

स्वार्थ-दम्भ के सायों से, रिश्तों को लगा ग्रहण।
शिकवे-गिलों की होड़ में, नेह का हुआ क्षरण।।

दो प्रेमी दिलों के बिच, दो ध्रुवों के हैं फासलें।
नजरों से मिली नजरें, हुएँ सँग जीने के फैसले।।

वक्त की ज्यादतियों ने, लूटा अरमानों का शजर। 
तेज हवाएं जब चली, सूर्ख पात हुएं दर-बदर।।

अपने में सिमट गएं, जैसे कछुएं अपने खाल में।
पहेलियाँ बुझाते-बुझाते, फंसे मकड़ी के जाल में।।

मतलब के रिश्ते-नाते, अक्सर बेमानी मनु खेल में।
शोहरत में शामिल, छू-मंतर हुएं हैं रेलम-पेल में।।

सपनों का संसार सजाना, हक है हर एक बन्दे का।
पाँखों दो असीम बल,पंछी को भय न हो फन्देका।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

*चित्र मिडिया के सौजन्य से (डिजिटल आर्ट-AI -राजन धनराज द्वारा रचित )
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