लाल-केसरिया रंग उछालती,
आई मतवाली, चंचल शाम!
अबीर, ग़ुलाल से रंगी चुनर,
शरमाई राधा देख श्याम!
अस्ताचल का रक्तिम सूरज,
छुपा झुरमट के उस पार,
अधरों पर ठहरी लोक-लाज
अधीर मन की तकरार!
कजरारे कान्हा की आँखों में,
काहे ढूंढे राधा छवि अपनी?
काहे भटके कानन-कानन,
सुन बांसुरी-धुन प्रीत भीनी?
मन के सरवर में उतरा सूरज,
अक्स नीर में झिलमिलाएँ
चम-चम चमके चुपके चाँदनी,
चाँद कोहनी मार मुस्काएँ!
पंखुड़ियों की सेज पर पहुडी
सजी-धजी निशा विरहिणी!
राह तके कालिंदी तट खड़ी,
व्याकुल राधा कृष्ण दीवानी!
प्रीत की रीत जाने न मानिनी,
विरह वेदना से पानी-पानी!
आदित्य पहुडियों भूल रातरानी,
श्याम करें सखी मनमानी!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!