पावन स्मृतियाँ...

शीर्षक : पावन स्मृतियाँ!

 

मनमंदिर में प्रस्थापित हैं,

माता-पिता की पावन स्मृतियाँ!

संगमरमरी गर्भगृह में मानों,

प्रतिष्ठित सियाराम की मुर्तियाँ!

 

तपती धूप हो या ठण्डी छाँव,

शामियाना सज़ा था आँगन में!

खुशनुमा बयार या आँधी-तूफान,

लंगर डाले नाव, समंदर में!

 

बरगद की मीलों फैली जड़ों से,

सींच रहे थे जो अपने वंश को!

नस-नस में बहते गर्म लहूँ से,

पोषित कर रहे थे वो अंश को!

 

झुकी-झुकी कमर, धुंधली थी नज़र,

पर शामिल थे हमारी दुआओं में,

लड़खड़ाते कदम, याददास्त कमजोर,

पर प्रयासरत अक्स की भलाई में!

 

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र|

 

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