गुरुपुष्यामृत

 

जब गुरुपुष्यामृत योग आया।

सुवर्ण आभ से मन ललचाया।।


छोटासा बटुआ लेकर इतराती। 

चली मन ही मन मुस्कुराती।।

 

लेने है मुझे झुमके सुंदर।

हीरे जडित अंगुठी बेहतर।।

 

नवलखा हार भी ले ही लूँगी।

नहीं दिलाया तो खूब लडूंगी।।

 

चांदी की पायल का भी मन हैं।

सातवे आसमान पर जो विराज है।।

 

भाव देखते ही सपनों में रोष हैं। 

सोने जैसे बनावटी गहने में संतोष हैं।।

 

स्वरचित मौलिक रचना

चंचल जैन

मुंबई, महाराष्ट्र 

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं