रासावलय छंद
नमन माँ शारदे🙏🙏
रासावलय छंद आधारित गीत।
रासावलय छंद: षटकल चौकल, षटकल पंचकल। पदान्त : 212,122,221
दिनांक : 23-6-2026

आस्था की चौखट, भगत भक्ति अपमान।
प्रभु छवि कर धूमिल, करते क्यों अवमान।

खुद उछाल कीचड़, रचा स्वार्थ बाजार।
अपराधी मन का, पैसा है आधार।।
भोले हैं भाविक, करते धन का त्याग।
धर्म-कर्म हित यह, पुण्य गुणा का भाग।।

प्रतिमा जब उजली, सुमिरण कर रख भान।
प्रभु छवि कर धूमिल, करते क्यों अवमान।

चाँदी या सोना, हो मोती अनमोल।
चरणों पर प्रभु के, चढ़ा बजा तू ढ़ोल।
पाप-पुण्य खाई, कैसे हो अब खत्म।
मानव जब देगा, सृष्टि सकल नित जख्म।।

मोह-राग बल पर, खड़ा सदा अभियान।
प्रभु छवि कर धूमिल, करते क्यों अवमान।

ओढ़ धवल चादर, छुपे नहीं सब दाग।
पडती प्रभु-लाठी, जलती तन-मन आग।
प्रभु  दे  जो धोका, फूटी  है तकदीर।
मानव कर  हत्या, भोगे अति अब पीर।।

आशा का निनाद, अमिरस का कर पान।
प्रभु छवि कर धूमिल, करते क्यों अवमान।

बन्दे अब देते, पापी को अभिशाप।
तोड़ रहे नाता, दण्ड  मिले अब नाप।
जैसी है करनी, भोग वहीं मनु आज।
बोयेगा जो तू, कांटों का सिर ताज।।

शाश्वत सच जाना, फिर भी तू अनजान।
प्रभु छवि कर धूमिल, करते क्यों अवमान।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।