दाम्पत्य जीवन की पराकाष्ठा यहीं कि जी रहे है,
शीशे के बिखरें टुकड़ों को समेट अश्क़ पी रहे है!
चाँद-सितारों की महफ़िल में अँधेरे निगल रहे है!
कतरा-कतरा रोशनी के लिए मर-मर जी रहे है!
खिलौनों से खेलना शौक फिर भी ख़्वाब बुन रहे हैं!
जिस्म से प्यार है उन पर फ़ना हो मुस्कुरा रहे है!
ज़िन्दगी में उम्र के ढलान पर फिस्सड़ी रहे है!
अतीत के मलबे तले दबी उम्मीदों के नशेडी रहे है!
किससे गिले-शिकवे, किसके मत्थे दोष मढ़ रहे है?
क्यों बेवजह आँगन में बिखरे पारिजात चुन रहे है?
क्यों ज़िन्दगी का रीता जाम बार-बार पी रहे है?
बची-खुची जो प्याले में उसी खुमारी में जी रहे है!
ज़िन्दगी-मौत के भंवर में क्यों गोते लगा रहे है?
कल रहें न रहें, ज़िन्दगी तेरे नखरे उठा रहे है!
थरथराते हाथों से टूटता आत्मविश्वास थाम रहे है!
बच्चों के नन्हें कंधों को जीने की वजह बना रहे है!
रिश्ते के महीन रेशम धागों को सब्र से बल दे रहे है!
वक़्त की बेंत की मार सहन कर भविष्य गढ़ रहे है!
स्वरचित एवं मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई , महाराष्ट्र