शीर्षक : संतोषामृत....
गाँव में कन्याशाला के उद्घाटन की बोली हमारे परिवार ने ली थी! परिवार के सभी सदस्य मौके पर चौका मारने का मन बना चुके थे! जाड़े की सर्द रातें, कड़कड़ाती ठण्ड और चूल्हे पर बना खाना खाने का मजा ही कुछ और था!
सासूजी ने दोपहर को ही मकई का आटा धाई माँ के घर से मंगवा दिया था और चवली और मुंग दाल की वडी तो सासूजी ने हमारे आने के पहले ही बना रक्खी थी! सर्द रात, गरमागरम मेथी-वरियों का स्वादिष्ट साग, बारीक कटा देसी गुड़ और धनिया- कासरी की चटनी और चूल्हे पर फुलाएँ मकई के सोगरे वाह भी गाय के घी से चुपडे हुएँ...
मेथी-वरियों का बड़ा पीतल का तपेला भर साग देख कर सासूजी ने टोंकना शुरु कर ही दिया था, "इतनी सब्जी... कौन खायेगा? कुछ तो बनाने का ढंग होना चाहिए न.." मगर मैं और मेरी देवरानी मुस्कुरा रहे थे! सभी बच्चें उछल-कुद में व्यस्त थे! इतना टोंकने पर भी हमारी मुस्कुराहट देख सासूजी बोल पड़ी, " ये दोनों हैं कि जब देखो, अपनी बत्तीसी दिखाती ही रहती हैं..."
आगे कुछ कहने-सुनाने से पहले हम रसोईघर में खाना परोसने के बहाने घुस गई... मैं सोगरे बनाने में जुट गई और देवरानी पानी के लोटा-गिलास भर कर देने में!
भरा-पूरा परिवार हमारा और बड़ी हवादार हवेली! देवर हमें देख हँसने लगे तो मैंने धीरे से कह ही दिया,"आज सब्जी बची तो मेरे बारा बजेंगे.. सँभालना जी"
चौक में जाजम बिछा दी गई और सभी चौरंग पर बड़ी थाली रख कर एक ही थाली में साथ-साथ खाना खाने लगे! राजस्थान की यह परम्परा मानों बनी ही इसलिए है कि सारे परिवार को जोड़ कर रक्खे!
सालों बाद गाँव की पुश्तैनी हवेली में किलकारियां और ठहाकें गूंज रहे थे! घर में खुशियों की वन्दनवार सजी थी! साथ-साथ खाना खाते-खाते सब्जी से भरी सारी तपेली कब खाली हों गई और हमारे लिए सभी 'महिला ब्रिगेड' के लिए तो चखने को भी सब्जी नहीं बची!
अब हमारी बारी थी! भले ही सब्जी नहीं बची थी और हम गुड़ और अचार के संग सोगरे का लुफ्त उठा रहे थे लेकिन सब दिल से बहुत खुश थे! कहते हैं न सयुंक्त परिवार में प्रेम हों तो रूखी-सूखी भी बहुत मीठी लगती हैं और अकेले खाने बैठे तो कलाकंद भी गले से नीचे नहीं उतरता!
सच ही हैं! परिवार के साथ हर पल, दुःख का हों या सूख का, जीने का मजा ही कुछ और होता हैं! सारा दिन थक कर, औरों से नज़रे चुरा कर, अपने कमरे में दूध का ग्लास लेकर साजन-मिलन को जाने का मजा ही कुछ और होता हैं मानों रोज ही मधुचन्द्रमा की रात! अपना दुःख-सुख बाँट कर मुस्कुराने का स्वाद, आनन्द ही कुछ और होता हैं! जीवन-उपवन में उगते सूरज को देख मुस्कुराने और साँझ को मुरझा कर अलविदा कहने पर भी संतोषामृत प्राशन का एहसास अकल्पनीय होता है!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र