रंगों में भीगे, शब्दों में जिएं....

रंग-रंगीलो फागण आयो, उमंग-उल्हास रो खजानों लायो रे!

तपती धरा ने रिझावा-मनावा, मतवालों फागण आयो रे!

होली री फुहार, बसंत बहार, मौज-मस्ती सु हिवडो हर्षायो रे, 

ठंडी-ठंडी पुरवा संग, ठंडाई-भांग रो खुमार लायो रे!!


रंग-अबीर-गुलाल, हथेलियां भर-भर, मन भरमायो रे !

हिवड़ा मां हिरा-माणक-मोती सजा, बहु हरषायो रे !!


देश-देशावर री खबरां संग, कोयलडी संग, संदेशों आयो रे!

हय्या री कोर म्हारा साहेब जी, फाग सजावन, महले पधारिया रे!


सजाऊ सोना-रुपा रो थाल, मोतियन माल, आरती उतारु रे !

साजन पधारिया जी महलों माय, घूंघट माय मुखडो, छुपाऊ रे!


किण विध करू बखाण, म्हारा रंगीला-छबिला साहेबा रे!

म्हांरा अधरों रा खिलिया गुलाब, करे चुगलियां हजार रे ! 


बिछी सेज, फूल गुलाब-चंपा-चमेली, 

नाच नचावे जी मोरलो !

झीणी सलवटों बीच, बांध गयो साजण, प्रीत रो रेशमी डोरलो !


चोऴी म्हारी भिगोय गयो रे, नवरंग सु 

साजण अंतरंग!

चढ़ गई देखो जी म्हाने, साहेब जी संग, ठंडाई में घुली भंग !

फाग रा फुलडा जी बिखरियां, महक्यों धरणी रो अंग-अंग!

केसरिया चुनर लहरा, पुरवा बजावे, ढोल- मृदंग!


स्वरचित तथा मौलिक,

द्वारा कुसुम सुराणा, मुम्बई।


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