भाग १४
बंगले के आँगन में सुबह-सुबह आराम कुर्सी लगा कर बैठे आबा ने अख़बार पर नज़र घुमाई और चाय की चुस्कीयाँ लेने लगे! अख़बार का मुख्य पृष्ठ युद्ध की खबरें, राजनीति के आरोप-प्रत्यारोप, सांप्रदायिक तनाव, दंगे, खून-खराबा जैसी नकारात्मक रोजमर्रा की खबरों से भरा पड़ा था! रोज की यहीं सुर्खियां देख आबा उकता गए थे.. लगता था दुनिया में कुछ अच्छा, मानवता का जयघोष करता, नैतिकता का परचम लहराता कार्य हो ही नहीं रहा हैं.. तभी उनका ध्यान दैनंदिन तिथि, वार पर गया! अरे वा! आज तो मंगलवार है ...गणेश जी का वार! वह खुशी से उछल पड़े...उन्होंने झट से फ़ोन उठाया और वैदेही की माँ जानकी को फ़ोन लगाया.. "पोरी! सिद्धिविनायकाचे दर्शन करूँ या म्हटलं आज... दो-तीन दिनों के बाद ये बच्चे .. ये 'स्वच्छन्द परिंदे' कॉलेज चले जाएंगे.. उसके पहले सिद्धिविनायक जी के दर्शन कर लेते हैं.. प्रतिभा और मेरे माता-पिता का बहुत मन था लेकिन क्या करूँ? दीवाली की भागदौड़ में जाना ही नहीं हुआ...उनका तो मन का मन में ही रह गया... जानकी! वो यश की मम्मा को भी पुछ लेना.. शायद यश के पापा भी आए होंगे... सब साथ ही चलते हैं... विघ्नहर्ता को धन्यवाद भी दे आते हैं..बच्चों के लिए बाप्पा के पास आशीर्वाद भी मांग लेते हैं...काय म्हणते पोरी?"
"आबा! यश की मम्मा को पूछ कर बताती हूँ दस मिनिट में " कह कर जानकी ने फ़ोन रख दिया और वैदेही से बात कर उसे यश को फ़ोन लगाने को कहा..
"हाय वैदेही.. आज सुबह-सुबह? " अरे गोलू-मोलू! यह कॉल तेरे लिए नहीं रे.. मेरी आई तेरी मम्मा से बात करना चाहती है यार.... और यश ने मुस्कुरातें हुए माँ के हाथ में फ़ोन दे दिया और वैदेही की माँ उनसे बातें करने लगी...
इतने दिनों के तनाव, पीड़ा, बेसब्री के बाद कौन नहीं चाहेगा सुकून के दो पल! सब ने फट से हाँ कह दी और शाम पांच बजे का समय भी तय हो गया! जानकी ने आबा को फ़ोन कर कह दिया कि पांच बजे आयेंगे यश के मम्मी-पापा और वह भी पहुँच जाएगी आबा के घर पर!
आबा की खुशी का कोई पैमाना तो था नहीं वरना आज वह लूर-लूर जाता! वो तो तीनों को भी साथ ले जाना चाहते थे बाप्पा के दरबार में लेकिन वह भीड़ से डर रहें थे.. उन्होंने सोचा कम से कम सिद्धिविनायक जी की प्रसादी तो उन्हें खिला पाएंगे वो ...
आबा ने वैदेही, यश को भी बुला लिया था घर पर... एक तरफ इनकी भविष्य की योजनाओं की रुपरेखा तैयार होगी और दूसरी तरफ बुजुर्गों तथा गणपति बाप्पा का आशीर्वाद! कितना सुन्दर, अतुलनीय योग!
समय के सभी पाबंद थे...क्योंकि जो समय की कीमत नहीं करता, उसका समय भी सम्मान नहीं करता यह हकीकत वो जानते थे....पांच बजे आबा के घर पर सभी उपस्थित हो गए थे! ऐसे लग रहा था आबा के घर पर आज ही दीवाली की रौनक बिखरी हैं.. खुशियों के दीप जगमगा रहें हैं...
सफलता की सीढ़ियां चढ़नी हो तो अनुशासन तथा समय का मूल्य समझना अति-आवश्यक हो जाता है....यह शाश्वत सत्य वो सभी अपने जीवन के अनुभव से भली-भांति जानते थे....
कितने दिनों बाद अपने अभिभावकों को इतना खुश देख 'युवा ब्रिगेड' के चेहरे भी कमलदल से खिल गएँ थे...
आबा ने ड्राइवर को बड़ी गाड़ी निकालने को कहा और सब निकल पड़े...
घर में अब यश, वैदेही और वज्र का ही राज था ... सिर्फ यही तिकड़ी जिनकी खातिरदारी में अन्नपूर्णा और उसका छोटा भाई.. जिसे सब छोटू कह कर ही पुकारते थे! वज्र ने अन्नपूर्णा को सबके लिए मिल्क शेक बनाने को कहा और तीनों भविष्य के सपने सजाने में व्यस्त हो गएँ!
वज्र और वैदेही क्लासमेट थे... बचपन से ही एक साथ पढ़ते आए थे.. दोनों वाणिज्य शाखा में द्वितीय वर्ष के छात्र थे.. साहित्य, अभिनय उनका शौक था... पढ़ाई में तो अव्वल थे ही वह लेकिन जब भी वे नुक्कड़ नाटक करते उन्हें बहुत सुकून मिलता! असली दुनिया से उनकी मुलाक़ात होती. ज़िन्दगी को करीब से देखने का मौका मिलता उन्हे!
यश व्यापार व्यवस्थापन में परास्नातक की पदवी पाना चाहता था..प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था वह! व्यवहार कुशल, स्पष्ट वक्ता, निर्भीक तथा बेबाक! आसपास की गतिविधियों पर पैनी नज़र और बिनधास्त, निडर वक्ता! यश का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जो भी उससे एक बार मिलता उसका हो कर रह जाता! हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाना कोई उससे सीखें! चेहरे पर नटखट हँसी और जुबान पर शहद से मीठे बोल!
वज्र फिर विनय के बारे में पूछें उसके पहले ही दोनों ने विषय को पटखनी दी और नये टॉपिक पर विचार-विमर्श शुरू कर दिया!!
तीनों ने साथ में कॉलेज जाने का प्लान बनाया! तभी वज्र को विभा और विनय की याद सताने लगी! वह बोल पड़ा, "वैदेही! विभा की कुछ ख़बर..कब आ रही है वह मुम्बई?"
यश और वैदेही एक साथ बोल पड़े, "वज्र! कुछ दिन बाद ज्वाइन करेगी विभा हमें! हफ़्तेभर में उसकी प्लास्टिक सर्जरी हो जाएगी.. कुछ दिन आराम कर पहुंच जाएगी मुम्बई!"
वज्र कुछ पूछने ही वाला था तब तक अन्नपूर्णा मिल्क शेक लेकर आई और बात का सिरा वहीं टूट गया! वैदेही दोनों को मोबाइल पर पुराने फोटो, जो विनय के मोबाइल से आबा ने भेजे थे, यश और वज्र को बताने लगी...यश का विनय के साथ ढ़ोल बजा-बजा कर नाचते-गाते हुए श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध करने का हुनर देख वह बोल पड़ी.. "क्या बात है हैंडसम! एकदम छा गया है यार! यश! तुमने तो कलेजा ही निकाल कर रख दिया है नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति में..यूँही नहीं इतनी भीड़ इकट्ठा हुई थी उस दिन ...
तीनों यादों के भंवर में गोते लगा रहें थे.... मानों वक्त के आवर्तों में फंसी सुहानी हकीकत से रूबरू हो रहें थे !
वैदेही ने झट से सारे फोटो समेट लिए! उसे पता था वज्र के लिए ज्यादा उत्तेजना अच्छी नहीं है !
तीन घण्टे बीत चुके थे.. परिधान से लेकर प्रस्थान तक का प्लान बन चूका था..अभी तक सिद्धिविनायक के दर्शन कर वरिष्ठ मंडली लौटी नहीं थी! तभी वैदेही बोल पड़ी.. आरती के लिए रुके होंगे.. यश कहाँ पीछे रहने वाला था..
अरे! सब के सब चारों मूषकों को 'जादू की झप्पी' दे कर अपनी-अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए दबाब डाल रहें होंगे.. बेचारे विनायक जी! स्वयंभु है तो क्या हुआ.. किस-किस की सुनेंगे भाई?
वज्र भी हँस पड़ा... तभी गाड़ी की आवाज़ आई और वज्र बोल पड़ा..." पूरी सेंचुरी मारेंगे यार सारे..पूरी सौ साल की उम्र है इनकी... नाम लिया और हाजिर!"
सब के चेहरे खिले-खिले... मानों विघ्नहर्ता ने जादू कर दिया हो... सब बच्चों को बाप्पा का प्रसाद खिलाया और उसके बाद ही उन्होंने पानी पिया!
यह विधाता में विश्वास ही तो है जो विपदा में इंसान को चट्टान सा मजबूत बन कर लड़ने का अटूट हौसला देता हैं जो हारी हुई बाजी को जीत में बदलने का माद्दा पैदा करता हैं...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
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