ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५५
भाग ५५

वैदेही की खुशी का ठिकाना नहीं था। परिंदों की चहचहाहट से वह भोर में ही जाग गई थी। सुबह की सर्द हवा भी उसे सुहावनी लग रही थी। सूरज भी गुलाल बिखेरते हुए फलक को अपनी आभा से सम्मोहीत कर रहा था। प्रकृति का श्रुँगार देख वैदेही की मन की पाँखे खिल उठी। सृष्टि की सुंदरता के साथ उसका अनुशासन भी अनुकरणीय था। सभी अपने कर्तव्य समयबद्ध तरीके से पूरे कर रहे थे। वैदेही कैसे पीछे रहती?

विनय के माता-पिता वीर बहादुर सिंह जी तथा राजरानी जी का वैदेही और आबा को फोन आया था। टीवी पर लाइव कार्यक्रम में वैदेही को वक्तव्य देते देख उन्हें बहुत ख़ुशी हुई। वैदेही थी ही ऐसी! हर किसी के दिल में अपनी जगह बना लेती थी कुछ ही पलों में! उसकी मीठी शहद घुली वाणी मानों मरहम का काम करती थी पीड़ित-शोषित के लिए! पैसा भले ही कम था लेकिन दिल बहुत बड़ा था वैदेही का! उसकी सरलता-सादगी नीले अम्बर में तैरते धवल बादलों सा सभी का मन मोह लेती थी। 

नित्य कर्म सम्पन्न होने के बाद वह स्नान के लिए चली गई। तैयार होकर उसने विघ्नहर्ता तथा पिता के फोटो के सामने दीप जलाया, धूप-अगरबत्ती जला कर पूजा-अर्चना की और अपनी नियुक्ति का पत्र गणपति बाप्पा के सामने रख कर वह गायत्री मन्त्र बोलने लगी। शब्द-शब्द गूंज रहा था मानों आस-पास के वातावरण को शुद्ध-निर्मल बना रहा था! 

तभी वज्र का फोन आया। माँ ने चाय-नाश्ता बना कर उसके टेबल पर रख दिया था। वह अपने कमरे की ऒर चली गई और फोन पर बातें करने लगी।

आज यश को लखनऊ जानेवाला था। सभी मित्र-मण्डली ने उसे शुभकामनाएँ देने के लिए सुबह-सुबह उससे मिलने का कार्यक्रम बनाया था। वैदेही जल्दी-जल्दी तैयार होकर वज्र का इंतज़ार करने लगी। आबा की ही कंपनी 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' में उसे अगले हफ्ते से जुड़ना था। हफ्ते के दो दिन ऑफिस में जाना था और वहीं से कामकाज सँभालना था और बाकी तीन दिन घर से ही काम करना था। एक तरफ पढ़ाई का तनाव तो दूसरी तरफ नए काम का बोझ! मित्र-मण्डली के नए-नए अभियान को अमली जामा पहनाने का मुख्य उद्देश्य स्वयं को व्यस्त रखने के साथ-साथ समाज से जुड़ना भी था ताकि दुनियादारी की असली तस्वीर आँखों के सामने हो!

खाली किताबी ज्ञान से जीवन की वैतरनी पार नहीं होती यह मित्र-मण्डली जानती थी!। एक है किताबी दुनिया तो दूसरी हैं यथार्थ की दुनिया! दोनों में जमीन-आसमान का फर्क होता हैं। एक है हवाई यात्रा तो दूसरा है रेल का द्वितीय श्रेणी का सफ़र! एक तरफ हर सुविधा से लेस, रुई के कोमल फाहें सी हवा में तैरती, कल्पना-लोक में उड़ान भरती सुखमय यात्रा तो दूसरी तरफ मर्यादित सुविधाओं में भी ज़िन्दगी के सफ़र के अनगिनत अवरोधों को पार कर फौलाद बन ज़िन्दगी का मज़ा लेने का हुनर! 

वज्र अभी-अभी वैदेही के यहाँ पहुँच चूका था। जानकी जी ने उसे भी नाश्ते के लिए कहा। वज्र सचमुच नाश्ता कर कर आया था लेकिन सामने रक्खे सूजी के लड्डू देख उसका स्वयं पर से नियंत्रण ख़त्म हो गया और उसने बेझिझक झट से वह लड्डू उठाया। जानकी जी के हाथ के लड्डू बहुत ही स्वादिष्ट बनते थे। वज्र इस बात को भली-भांति जानता था। सूजी के लड्डू  उसकी कमजोरी था। बचपन में कई बार वह खुद का लड्डू तो खा ही जाता था बल्कि वैदेही को दिया हुआ लड्डू भी खुद ही चट कर जाता था और वैदेही बेचारी उसके फूले हुए गालों को देखती रह जाती थी अवाक सी।

वैदेही ने विभा को फोन लगया! विभा तैयार हो कर उन्हीं के फोन का इंतज़ार कर रही थी। विभा झटपट पर्स ले, दरवाजा लॉक कर नीचे उतर गई! तीनों यश के घर की ऒर निकल पड़े। यश की आज शाम की फ्लाइट थी! 

तीनों ने उसे शुभकामनाएँ दी। विभा बोल पड़ी, " ये हीरो! वहाँ इधर-उधर तांकते मत बैठना! खेल में ध्यान देना! सिलेक्शन जरुरी हैं! फिर देख! कैसे जश्न मनाते हैं हम सब!"
यश मुस्कुरा कर बोल पड़ा, " अरे मेरी झाँसी की रानी! मित्र-मण्डली की शुभकामनायें साथ हैं मेरे! जी-जान लगा दूंगा यार! "

विभा जानती थी! यश जी जान लगा देगा! बहुत जिद्दी हैं वह यह तो जानती थी वो! नितीन सर साथ थे तो किस बात की चिंता! अपने खिलाडी की हर बात का पूरा खयाल रखते थे वह! छेनी से ठोंक-ठाक कर तराशने के लिए मजबूत पत्थर ही ढूंढ कर लाते थे नितीन सर ताकि उससे शिल्प बना सकें! 
एक खिलाडी को ऊँचाईयों तक पहुंचाने में प्रशिक्षक का बहुत बड़ा हाथ होता हैं यह विभा स्वयं के अनुभव से जानती थी! सच में तो वह भी साथ जाना चाहती थी लेकिन नितीन सर ने यह कह कर मना किया कि पहली बार जा रहे हैं। वहाँ कैसी और किस तरह कि व्यवस्था हैं यह पता नहीं! हम लडके तो कैसी भी व्यवस्था में खुद को ढाल सकते हैं लेकिन एक लडकी साथ हैं तो आवश्यकताएं बदल जाती हैं और हर जगह वह उपलब्ध होगी ही यह संभव नहीं होता! 

नितीन सर दिलदार थे, सभी से उनके रिश्ते दोस्ताना थे लेकिन अनुशासन के मामले में बहुत कठोर! उन्होंने विभा को साफ़ शब्दों में कह दिया था कि मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे कारण यश का ध्यान बंट जाये! वहाँ राष्ट्रीय स्तर की चुनौतियाँ होगी और यश को अपना सर्वस्व दाँव पर लगाना होगा पूरी एकाग्रता के साथ!

सच ही कह रहे थे नितीन सर! विभा उनके प्रशिक्षण के तौर-तरीके, अनुशासन और कड़ी मेहनत और लगन को बखूबी जानती थी! विभा को भी वीणा के साथ प्रक्टिस करनी थी। उसका भी तो एक महीने के बाद मैच था! राष्ट्रीय स्तर पर हो रही बैडमिंटन स्पर्धा में उसका चयन इन्हीं प्रतियोगिता पर निर्भर था! 

वैदेही और वज्र यश के लिए सूखा नाश्ता यानि की थोड़ा चिवडा, शंकरपाली और बेसन के लड्डू बना कर लाएं थे! वैदेही ने अपने नियुक्ति पत्र की बात सबको बताई। सभी बहुत खुश हुएं। 
कभी-कभी खुशियाँ भी हाथ में हाथ डाल झुमती हुई आती हैं और पूरा वातावरण मंगलमय बना देती हैं! वैदेही के किस्मत के सितारें बहुत तेज थे। अब यश की बारी थी।सभी यश के गले मिले, उसे फिर एक बार शुभेच्छा दी और अपने-अपने घर की ऒर निकल पड़े!

विभा को रास्ते में घर के नीचे छोड़ वज्र और वैदेही आगे चल पडे! घर के पास गाड़ी पहुँचते ही वैदेही उतरने लगी तो वज्र बोल पड़ा, " वैदेही! घरी चल न! तुला एक सरप्राइज दाखवायचय!" 
वैदेही बोल पड़ी, "वज्र! आई वाट पहात असेल रे! " लेकिन वज्र मानने को तैयार नहीं था! वह बोल पड़ा, "वैदेही! थोड़ा वेळ चल न घरी " उसने वैदेही का हाथ पकड़ कर उसे फिर सीट पर बैठाया! वैदेही भी मन ही मन यहीं चाहती थी कि कुछ और समय तक वह वज्र के साथ रहे.... वज्र ने फिर उसे रुकने के लिए कहा और इस बार वह वज्र को मना न कर सकी! वह सम्मोहित सी वज्र के पीछे-पीछे चलने लगी!  वज्र ने अन्नपूर्णा को फ्रूट ज्यूस बनाने के लिए कहा और दोनों कमरे में चले गएं। 

कमरे में एक स्टैंड पर लगे कैनवास पर एक चित्र ढँक कर रखा हुआ था। पास में छोटे से टेबल पर अलग-अलग माप की कुंचियां , चित्रकारी के लिए विभिन्न रंगों से भरी प्लेट और पास में वैदेही के साथ वज्र का बचपन का फोटो! वैदेही उस फोटो पर झपट पड़ी! 

"यह फोटो कहाँ से आया तुम्हारे पास? कितना प्यारा हैं न!" वैदेही भावुक हो गई! बचपन की गलियाँ मानों उन्हें बुला रही थी। मानों वह टेड़ी-मेढ़ी गलियाँ उन्हें बचपन की मासूमियत लौटाना चाहती थी, उनकी मुस्कुराहट से बिखरे मोती चुन कर उन्हें सौंपना चाहती थी। यादों के परिंदों को पिंजरे की कैद से मानों मुक्त करना चाहती थी ! 

वैदेही अभी असमंजस में ही थी कि वज्र ने उसे कैनवास पर रखें आवरण को हटाने को कहा!  वैदेही ने झट से वह आवरण हटाया और कैनवास पर उतारा गया चित्र देख कर वैदेही भावुक हो गई! वज्र ने अपनी और वैदेही की बचपन की तस्वीर बनाई थी वाटर कलर से! चित्र में दोनों एक-दूसरे के कन्धे पर हाथ रख कर खड़े थे! कलाकृति में भी दोनों की आँखें बहुत कुछ बोल रही थी। आँखों में एक-दूसरे के प्रति गज़ब का स्नेह झलक रहा था। वैदेही ने पेंटिंग की भूरी-भूरी प्रशंसा की! वैदेही की प्रतिक्रिया देख देख कर वज्र भी बहुत अभिभूत था! उसे ऐसे लग रहा था मानों जौहरी ने असली हीरे की परीक्षा की हो। न जाने कैसे बंध थे यह जनम-जनम के....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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