आगाज़ से अंत तक,
संघर्ष का नाम बेटियाँ!
कोख से चिता तक,
जिजीविषा का नाम बेटियाँ!
बाबुल से ससुराल तक,
सफ़र का नाम बेटियाँ!
जीवन से मृत्यु तक,
जीवट का नाम है बेटियाँ!
सांसों के बीचों-बीच,
प्रयास-प्रयाण का नाम बेटियाँ!
बेटियाँ!
परिवार के उपवन में,
कुहूँकती कोयल हैं बेटियाँ!
आदित्य का ताप सह,
तुलसी सा जीवन देती हैं बेटियाँ!
अवरोधों के किचड़ में,
खिला पद्मकमल है बेटियाँ!
सूर्य को अलविदा कह,
दीप सी जल उजाला देती बेटियाँ!
घर-गृहस्थी की हर विपदा में,
आधार-स्तंभ बन खड़ी हैं बेटियाँ!
बेटियाँ!
माथे की लकीरों के बीच,
अक्षुण्ण सौभाग्य हैं बेटियाँ!
दो कुलों के रीति-रिवाज,
संस्कार-संस्कृति का सेतू हैं बेटियाँ!
उफनती लहरों में फंसी,
नौका के लिए दीपस्तंभ है बेटियाँ!
ममता के फटे आंचल की,
झीणी-झीणी सिलाई हैं बेटियाँ!
माँ के आंखों से झरते,
पानीदार मोतियों का तेज हैं बेटियाँ!!
स्वरचित और मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |