१एक आलिशान बंगला जिसके इर्द - गिर्द बड़े - बड़े पेड़ है। उन पेड़ों के बीच एक आलिशान विला जो एक सुपरस्टार का मकान है।
यह नामी अभिनेता का नाम किरण जुनेजा है तथा उनकी पत्नी सविता है। इन दोनों की लाड़ली बेटी का नाम निहारिका है जो बचपन से ही पूरे घर की लाड़ली बेटी है। हो भी क्यों नहीं? यह इस पूरे जायदाद की एकलौती वारिस जो ठहरी। सविता तथा किरण ने उसे बड़े नाजों से पाला है, बचपन से ही उसके सारे शौक पूरे किये है। वह जिस चीज़ के उपर अपनी नजर घुमाती वह शाम तक उसके सामने हाज़िर हो जाती ।
जैसे- जैसे उसकी उम्र बढ़ती जा रही थी वैसे वह अधिक नकचढ़ी और घमंडी हो गई। माँ ने उसे कई बार फटकार भी लगाई, साथ ही समझाने की बहुत बार कोशिश की तो वह अपने पिता की छत्रछाया में छुपकर स्वयं को सुरक्षित महसूस करती। किरण भी उसे फटकार लगाने की बजाय सविता को सुनाता, इसका असर यह हुआ कि निहारिका और अधिक शरारती होती जा रही थी। सविता ने वक्त रहते उसे बहुत समझाने की कोशिश की मगर कुछ असर ना हुआ और कुछ सालों बाद सविता ने अपनी जबान पर ताला लगा लिया।
निहारिका अब कॉलेज जाने लगी थी, उसके चेहरे का नूर अधिक तेजस्वी होने के कारण सब उसकी झलक पाने के लिए कायल हो जाते। उसकी सहेलियाँ मात्र दो ही थी, जो उसी के इर्द - गिर्द सदैव मंडराती रहती। वह हमेशा टॉप और जींस पहना करती, उसे सलवार और कमीज से साफ चीढ़ थी। वह तो आधुनिकता को ओढ़े रहती हमेशा, पुराना उसे कुछ भी पसन्द नहीं था ना पोशाक ना दोस्त।
रीता और सीमा ही वे दोनों दोस्त थे जो उसकी हर बात को बिना कोई शब्द निकाले सुन लेती, इसी कारण वह दोनों उसके साथ टिकी हुई है अन्यथा कब की दूर हो जाती। वह दोनों का भी उससे दोस्ती करने का फायदा था जिसकी भनक उन दोनों ने कभी निहारिका को लगने न दी।
निहारिका खुले विचारों और मस्तमौला स्वभाव की होने के कारण हर कोई उसके पास तो आ जाता मगर वह कभी किसी अपने आस - पास भी भटकने न देती। वह खुद के लिए जैसा लड़का चाहती थी वैसा उसे आजतक नहीं मिला था। आजतक बहुत सारे लड़कों ने उसे इश्क करना चाहा पर कुछ फायदा नहीं हुआ, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके नजदीक कौन है और कौन दूर?
निहारिका को उसकी सहेलियों ने भी चिढ़ाया और अपने मन की बात समझने की कोशिश की मगर वह ऐसे सवालों को हवा में उड़ा देती या हंस देती । ऐसे सवालों को हर बार नजर अंदाज करती रही है वो, पता नहीं चल पाता कि उसके मन में अपने होनेवाले जीवनसाथी के बारे में क्या है? वह कैसा है? कैसा दिखता है? यह सारे सवालों के जवाब शायद वह भी नहीं जानती थी।
रीता और सीमा दोनों ने ही कुछ दूरी बनाए रखी उससे ताकि वे उसका मन टटोलना चाहती थी, मगर एक माह हो गया था न उसे कोई फर्क पड़ा ना वे दोनों ही उसको समझ पायी।
निहारिका कभी ऐसा मौका नहीं छोड़ती और उसके साथ दोनों रहते ही। वह आना न चाहती तो भी जबरन उन्हें ले जाती, भला उन दोनों का खर्च उसे करना पड़े। निहारिका का मानना यह था कि हमारी ये जिंदगी एक तोहफे की समान है उसे खूब मस्ती के साथ जीना चाहिए। ये तीन- चार साल ही तो होते है जिस उम्र में हम अपने हिसाब से मौज करते हैं और हमें टोकने वाला भी कौन नहीं। जब कॉलेज में सैर की खबर प्राप्त हुई तो सारे छात्र एक दम से उछल पड़े लेकिन जब ये सूचना मिली की हम इस बार जंगल जा रहे थे तो सिवा दो - चार के सब भयभीत थे। निहारिका को तो ऐसे खतरनाक जगहों पर घूमना बेहद पसन्द है, एक अडवेंचर के रूप में वह हर बार ऐसी जगहों पर जाना पसन्द करती है।
२
सुबह से निकले छात्रों को अपने मुकाम तक पहुँचते- पहुँचते शाम हो गई थी । वही उन लोगों ने तंबू गाड़ दिए, सारे छात्रों ने मिलकर तंबू बांधे तो छात्राओं ने खाने का सामान। रात के करीब आठ बजे तभी दूसरा समूह वहाँ पर आ पहुँचा। जगह बड़ी थी तो उनके रहने की भी व्यवस्था हो गई।
सुनहरी चांदनी रात में सबने मिलकर अंत्याक्षरी खेलने का निश्चय किया। दो गुट वैसे ही थे तो दोनों गुटों में होने वाली स्पर्धा रंगत भरी होने वाली थी और जब ज्यादा खिलाड़ी मैदान में उतरे हो तो उसका मजा दुगुना हो जाता है।
पहला गाना बेशक निहारिका ने ही शुरू किया, उसके मुख से यह प्यारा गीत सुनकर सब मंत्रमुग्ध हो गए। उसने गाना भी प्यारा चुना था। उसके लब से " प्यार में एक नगमा " यह गीत बहुत ही आकर्षक था। उसकी वाणी में जो लय और माधुर्य था, उसका कोई जवाब नहीं।
एक- एक कर दो - तीन घंटे गुजर जाने के पश्चात भी कोई हारने वाला नहीं था। दोनों और से एक से बढ़कर एक गीत सुनाई दे रहे थे, दर्शकों के ऑंखों से भी नींद कोसों दूर थी। हाँ ज्यादातर दर्शक ही भरे पड़े थे महफ़िल ताकि असली जुगलबंदी तो निहारिका और सोहम के बीच चल रही थी जो थमने का नाम नहीं ले रही थी।
सोहम की वाणी भी किसी मंजे हुए गायक से कम नहीं थी, उसके दोस्त तो उसे " रामपुर का किशोर कुमार " कहते थे। सोहम को यह उपाधि उसके दोस्तों ने दी पर वह स्वयं को ऐसा नहीं मानता।
अब तो आधी रात बीत चुकी थी लेकिन कोई ऐसा नहीं था जिसे नींद लग रही थी, मानों इस जुगलबंदी ने सबकी थकान मिटा दी हो । दर्शकों का उत्साह और साथ ने तो दोनों का दिल जीत लिया। आखिरकार सूचना मिली तो सबों ने अपने नेत्र बंद कर लिए और सब सोने के लिए चले गए।
सुबह होते ही सोहम जल्दी उठ गया, भले वो रात को देर तक जगता रहे लेकिन वो सुबह जल्दी ही उठता। उसे अब आदत हो गई थी और उसे अच्छा भी नहीं लगता देर तक लेटे रहना।
उसका परममित्र पूरन उसे कहने लगा, वाह मेरे "रामपुर के किशोर कुमार " कल रात को तो महफ़िल में चार चाँद लगा दिए, सब लोगों ने जमकर तारीफ की। गला तो माशाअल्लाह खूब पाया है लेकिन दिमाग भी बहुत स्ट्रांग है, न जाने मौके पर कैसे लबों पर आ जाते हैं गीत वह भी एक से बढ़कर एक।
पूरन तुम्हें कितनी बार कहूँ कि मेरी तारीफ मत किया कर, तू मुझे भलीभाँति जानता है मुझे यह सब पसन्द नहीं.. सोहम ने बेरूखी से जवाब दिया।
भले तुम्हें ना पसंद हो लेकिन तुम्हारी आवाज बहुत सुरीली है और तुम्हारी भिडंत जिस लड़की से हुई क्या नाम उसका( याद करते हुए) हाँ याद आया, निहारिका बहुत ही अच्छी गाती है और दिखने में भी बहुत अच्छी है.. पूरन ने दोनों की तारीफ की।
सोहम ने उसे ऑंखें दिखाई तो वह कहने लगा, अच्छा बाबा अब कुछ नहीं कहूँगा। वाह! क्या मौसम है, नहीं तो हमारा शहर सब धुआँ- धुआँ.. बात बदलते हुए पूरन ने कहा।
मुझे तो बहुत सुहाना लगता है ऐसा मौसम, मुझे ऐसे माहौल में जीवन गुजारना है पर हम कर भी क्या कर सकते है? .. बात करते करते एकदम गंभीर हो गया सोहम।
वह ऐसा ही है बात कोई भी हो वो गंभीर हो जाता, वह अपने चेहरे पर ज्यादा समय तक खुशी टिकने ही नहीं देता। वह आनंदित भी रहता तो सिर्फ कुछ पल भर और अकस्मात ही उसकी सारी खुशी कहीं गुम हो जाती। उसे किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो उसके दु: ख मिटा सके किंतु वह अभी तक खयालों में ही थी।
कुछ देर बाद बचाव, बचाव की ध्वनि सुनाई दे रही थी, तो वह उठकर उस ओर भागा तो देखा कि निहारिका जंगली हाथी के झुंड के पास जाकर एकाएक रूक गई और भयभीत हो गई। उसकी चीख सुनकर सब दौड़े - दौड़े उसके पास आ गये किंतु आगे आने की हिम्मत किसी ने नहीं की।
सोहम ये कतई देख नहीं सकता कि मेरे सामने कोई परेशानी में है तो उसने हिम्मत कर उसकी और दौड़ पड़ा। उसे लेकर वह बाहर निकलता तभी बड़ा हाथी उनके समक्ष आ खड़ा हो गया जिसे देखकर सोहम की सिट्टी- पिट्टी गुम हो गई । निहारिका को अंदेशा हो गया कि ये भयभीत है, तो अपनी पूरी मेहनत से उसे साथ लेकर लंबी छलांग लगाते हुए वह दोनों बाहर निकल आये। उन दोनों का ऐसा रूप देखकर सब आश्चर्यित थे।
३
दोनों गुटों में अब दोस्ती हो चुकी थी, साथ ही दोनों का मकसद भी एक ही था। सारे एक साथ ही सैर पर निकल पड़े।
निसर्ग की अनुपम छटा, ये मंद - मंद हवाएँ और बीच में कलकल बहता पानी का प्रवाह सबके हृदय में एक स्वर्णिम आत्मानुभूति देता रहा। इन वादियों ने तो सारे छात्रों का रोम रोम हर्षित कर दिया था। उनके लिए ये सब किसी सपने का साकार रूप ही था। शहरों की साफ सड़कें भी इन मटमैले रास्ते के सामने फिकी लग रही थी, निश्चल और स्वच्छ पानी का बहता हुआ बहाव तो सभी के लिए नया - सा था क्योंकि शहरों में अब साफ पानी कम ही नजर आता है। परम शांति का अद्भुत नजारा था यहाँ पर जो सबको अंदर से आल्हादित करता रहा।
हंसते- गाते सभी एक एक कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़ रहे थे और जंगल सफारी का आनंद उठा रहे थे। निहारिका का तो मन और ऑंखें बस सोहम को देख रही थी, उसके चलने का ढंग बोलने की भाषा, हर एक हरकत पर नजर थी । उसके चेहरे का हावभाव और अनुशासन निहारिका का दिल कायल कर रहा था, मन ने तो ठाम लिया था मगर दिल अभी इंतजार कर रहा था उसे वक्त चाहे था मगर आकर्षक छवि ऑंखों में बस चुकी जो स्वयं को उससे दूर नहीं देखना चाहती।
यार, रीमा कुछ कर तो अब मुझसे रहा नहीं जाता, अपने दिमाग का बल्ब चालू कर और कोई बढ़िया सी तरकीब तो दे.. बेहद उतावले ढंग से निहारिका ने विनय की।
सीमा अब तुम ही समझाओ इसे घंटे भर की मोहलत ने इसे पागल कर दिया है, इसे समझा की जीवन का यह फैसला उतावले होकर नहीं धीरज और शांति से लिया जाता है.. रीमा ने बजाय निहारिका को समझाये सीमा को उसकी बैचेनी के बारे में कहा।
निहा, कुछ सब्र तो करो अभी उसे मिले वक्त ही कितना बिता है दो दिन है न कोई न कोई तरकीब जरूर मिल जाएगी, अब उसे यूँ बार - बार देखना बंद कर और सीधे- सीधे चलो। तुम्हारी इन हरकतों से रही बात भी नहीं हो पायेगी.. सीमा ने उसके चेहरे को नीचे करते हुए समझाया।
सीमी ऐसा न कर अब सब्र ही तो नहीं हो रहा, बस चाहत और तड़प हैं उससे अभी मिलने की.. बेसब्री से निहारिका कहने लगी।
निहारिका की ये तड़प देखकर सीमा और रीमा दोनों का ही दिमाग काम करना बंद हो गया। उन्होंने जैसे- तैसे उसे मनाकर शांत किया और आगे बढ़ती रही।
उनके कहने पर निहारिका शांत तो हो गई पर मन के अंदर उठता ज्वार - भाटा उसे हर क्षण तड़पा रहे थे। किसी के लिए मन में इतनी बैचैनी उसे कभी महसूस नहीं हुई जो आज हो रही थी। न जाने क्या था उनके बीच कोई ऐसी मित्रता जो किसी को अंदर नहीं आने देना चाह रही थी। आकर्षण तो नहीं था ताकि निहारिका इतनी साधारण नहीं जो किसी को भी अपना दिल दे बैठे। आजतक कितने सारे लड़के उससे दोस्ती करने के लिए तैयारी के साथ आये मगर उसने किसी एक की भी नहीं सुनी। जो निस्वार्थ प्रेम मन की तरंगों में उठ रहा था उसे प्रतीत करने का साहस वह जुटा नहीं पा रही थी। इतनी हलचल उसके दिल में कभी अभिभूत नहीं होती पर कुछ तो था जो उन दोनों को एक करने वाला था, एक ऐसी कड़ी जिससे दो अनभिज्ञ थे।
रात का समय था, सब अपने अपने जगह आ गए। निहारिका का तो मन कर रहा था कि अभी जाकर उसे प्यार के वो तीन शब्द कह दे। मगर जैसे ही वह उसके पास गयी तो एक आवाज सुनाई दी जिसे सुनकर उसका दिल तार - तार हो गया। वह आवाज सोहम की ही थी और वह कह रहा था, " नहीं मैं तुमसे नहीं मिल सकता ना मुझे तुमसे मिलने की ख्वाहिश है, कितनी दफा कहूँ कि मेरे दिल में सिर्फ एक लड़की है और वह तुम नहीं। " ये शब्द सुनकर निहारिका कांप उठी। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे वे चाह रही है वो पहले से किसी और का हो चुका है। ये बातें सुनकर वह उल्टे पैर वापस आ गयी।
रीता और सीमा उसे यूँ फफक- फफककर रोते शायद पहली बार देख रही थी, सब बाल बिखरे हुए , तकिये के नीचे मुंह दबाकर रोती रही कि आवाज बाहर न जा पाए। रीता और सीमा दोनों ही अनजान थी इसलिए उन्होंने सोचा कि खुशखबरी सुनाऊँ। वे दोनों उसके पास बैठ गयी।
निहा , हमने आज देखो कितना बड़ा काम किया है तू सुनोगी तो उछलने लगोगी.. रीता ने हंसते हुए कहा।
जाने भी दो सीमा वह क्या करेगी जानकर? आज पहली बार ऑंसू बहा रही है रोने देते है.. सीमा ने चिढ़ाते हुए कहा।
नहीं सीमा हमारी खास है वो और कैसे इसे यूँ रोने दे, घरवाले तो मुझे ही डॉंटेंगे न कि क्यों रूलाया इसे.. रीता ने सीमा को ऑंख दिखाते हुए कहा।
अब बस भी करो, मैं जानती हूँ तुम्हारा मजाक बात क्या है?.. निहारिका ने सहज होकर कुछ रोनी सी आवाज में कहा।
ऐसे नहीं पहले अपने गीली ऑंखें साफ करो.. रीता ने अपने हाथों से उसके ऑंखें पोंछी।
अच्छा, अब बताओ भी.. निहारिका ने उत्सुकता से कहा।
ये देखो ये नंबर तेरे लिए लायी हूँ, तुम्हारे होनेवाले हमसफ़र सोहम का है.. हंसते हुए उसके हाथ में कागज का टुकड़ा देते हुए सीमा ने कहा।
ये बात सुनकर निहारिका और जोर- जोर से ऑंसू बहाने लगी, जिसे देखकर वह आश्चर्यित हुई, क्योंकि उसका नंबर निहारिका को चाहिए था पर वो इस दृश्य को देखकर स्तब्ध थी। निहारिका रीता की बांहों में आकर रोती रही और सीमा और रीता दोनों क्या बात है? इस भाव के साथ एक- दूसरे को देखने लगी।
४
निहारिका ने जो कुछ सुना वह दोनों को बता दिया, जिसे सुन वह दोनों ही जोर - जोर से ठहाका मारकर हंस पड़ी। बात थी तो हंसने वाली फिर वो खुद को कैसे रोक पाती?
दोनों की ये हंसी निहारिका को विचित्र- सी लगी, अगर किसी को खुश करने के लिए ठहाके लगाना जरूरी है तो किसी की भावना पर हंसना पागलपन। जो बातें उन्हें बतायी वो हर एक शब्द सच्चा था, लेकिन हर एक बात का मजाक बनना ही है तो क्रोध आना स्वाभाविक है । जब अपने प्यार पर से विश्वास टूट जाये और एक दिन मजाक हो जाये तो उसका दर्द किसी मरहम लगाने से भी दूर नहीं होता।
क्यों क्या हुआ ? अब बस हो गया मैं कुछ सह नहीं सकती?.. गम्भीर होकर निहारिका ने कहा।
तुम्हें कुछ गलतफहमी हुई है, ऐसा कुछ नहीं है वह तो साफ दिल का लड़का है वह भी आजतक किसी का नहीं हुआ.. सीमा ने साफ शब्दों में कहा।
तो क्या मैं झूठ बोल रही हूँ, जो देखा वह सब फरेब है, जो सुना वह गलत है.. निहारिका अपने ऑंसूओं को दबाते हुए कहती रही।
निहारिका की पीड़ा को वह दोनों समझने की कोशिश करने लगी, पर उन्होंने जो कुछ सुना वह तो गलत नहीं मगर निहारिका को कुछ गलतफहमी हुई ऐसा भी संभव नहीं। हर एक शब्द उसकी आह से निकल रहा था कि वो किसे के संग बंधा हुआ है, किसी से प्रेम करता है। ये सुनकर रीता और सीमा दोनों दंग थी, उन्होंने बीते कुछ सालों में निहारिका का ये रूप कतई देखा नहीं था। उसका ये पहला- पहला इश्क़ है जो शुरू होने से पहले ही बिखर गया था। वह रोती रही, लगातार ऑंख से ऑंसूॅं बहते रहे। रीता और सीमा बस थपकियाँ देती रही और एक- दूसरे को निहारती रही। जब घंटे भर बाद वह सो गई तो वे दोनों उसे सुलाकर बाहर आ गई।
यार रीता कुछ तो करना होगा आज मैंने उसकी ऑंखों में एक अजीब सी कशिश देखी है जिसपर मैं कभी विश्वास नहीं कर सकी, इतनी तड़प, इतनी चाहत और बैचेनी उसके दिल में कभी नहीं देखी जो आज सोहम के लिए देख रहीं हूँ.. सीमा ने निहारिका की तरफ देखते हुए रीता से कहा।
पता नहीं पर कैसे? लेकिन कुछ बदली हुई सी लगती है हमारी निहू, अचानक से उसके दिल में किसी के प्रति इतना मोह मुझे विश्वास नहीं होता? हमारा काम है उसे इस तकलीफ से बाहर निकालना, चलो अभी हम उसे मिलकर आते है.. रीता ने कहा तो वे दोनों ही सगुना के पास चली गई।
तंबू के भीतर गपशप चल रही थी तभी उन दोनों ने सगुना को आवाज देकर बाहर बुला लिया।
सगुना ये क्या बदतमीजी है? तुमने हमें गलत क्यों कहा कि वह लड़का साफ दिल का है.. रीता ने आते ही बवाल मचा दिया।
रीता तुम कुछ भी कहोगी और हम मान लेंगे, तुम सोच भी कैसे सकती हो कि सोहम गलत लड़का है। तुम तो अभी मिली हो मैं उसे बरसों से जानती और समझती हूँ.. सगुना भी अपना आपा खो बैठी और जोर से बातें करने लगी।
सीमा न रहती तो बवाल हो जाता। उन दोनों को शांत करते हुए जो कुछ हुआ वो सरल शब्दों में समझाया तभी मामला कुछ शांत हुआ।
सगुना सब समझ चुकी थी और उसने भी वातावरण की गम्भीरता को देखकर उन्हें समझाया, " ये बात है, तभी इतनी आगबबूला होती हो। ये तुम विनम्रता से भी पूछ सकती थी, लेकिन जाने दो यह स्वाभाविक ही है। दरअसल बात यह है कि सोहम के पीछे दस दिनों से एक लड़की लगी है जो उसे बार - बार फोन कर परेशान करती है। वह अकेली नहीं इसके पहले भी बहुत सारी लड़कियों ने उसे अपना बनाना चाहा किंतु वह सभी को आजतक यही जवाब देता रहा। मैंने तुम्हें उसका नंबर इसलिए दिया ताकि तुम उसकी कुछ मदद कर सको पर मैं यह नहीं जानती कि तुम्हारी दोस्त उससे प्यार करती है। हाँ, उसे कह देना कि ये सपना वह भूल जाये क्योंकि वह तो बस उसी एक लड़की की खोज में भटक रहा है जो बरसों से उससे दूर हो गई है, वह सिर्फ सोहम की है। अच्छा, एक बात बताओ निहारिका बहुत अमीर है न और शायद उसका परिवार फिल्मों में काम करता है, ऐसा मुझे सुनने को मिला है। "
हाँ क्यों? .. सीमा ने पूछा।
बात यह है कि वो अगर सोहम को काम दे सकती हो तो दे देना क्योंकि उसे गायकी से बहुत लगाव है.. कहकर वो तुरंत अंदर चली गई।
सीमा उसे रोक न पायी और वे दोनों एक- दूसरे की तरफ खामोश से देखते रहे।
५
सोहम अकेला था घर पर कुछ सोच रहा था, शायद वह यादें जो बीते महीने में उसके साथ हुई थी। एक अजीब- सी हरकत हुई थी उसे भी पर जीवन में इतने घाव भरे हुए थे कि उन सबके सामने सुख के क्षण कुछ टिकते नहीं थे। ये मकान तो उसे खाने को दौड़ता, कभी लगता कि यहाँ से दूर निकल जाऊँ जहाँ सिर्फ मैं रहूँ। अपने मन में भी तो बड़ी- बड़ी आकाक्षां पाल रखी थी जो उसे यहाँ से दूर नहीं होने देती।
एक वक्त था जब अपना भारी मन कुछ बातों से हल्का कर लेता अपनी माँ के साथ पर कुछ साल से बिल्कुल ही अकेला हो गया था। वह किसी को कुछ बता नहीं पा रहा था, एक प्रकार से खुद को किनारे कर लिया था स्वयं को। बस उसका एक साथी रह गया था जिसे वह चाहकर भी अपने से दूर नहीं कर सकता था और वह संगीत, लय और गीत। अपना सारा समय गीत रचाने और संगीत जोड़ने में लगाया बैठता, जैसे ही वो उसे दूर उठता वह बैचेन हो उठता। इस व्यवहार के चलते वह किसीसे घुलता- मिलता भी नहीं। रूखे और एकाकी स्वभाव के कारण वह घर में खुदको अकेला पाता। लेकिन वह दोस्तों के बीच एक अच्छे गायक की तरह दिनों दिन उभर रहा था, ये हिम्मत थी उसकी। यह गायकी न होती आवाज में तो शायद ही वह जिंदा रह सकता।
हैलो, मिस्टर सोहम मैं रंग मंदिर प्रोडक्शन हाउस से फोन कर रहा हूँ, क्या मैंने सोहम अवस्थी को फोन लगाया है.. एक अनजान नंबर से उसे फोन आया था।
हाँ,जी आपने सही नंबर लगाया है?बोलिए क्या बात है? .. सहजता से सवाल किया।
मिस्टर सोहम हमने आपकी गायकी को सुनकर फैसला किया कि आपको हमारी अगली फिल्म के लिए मौका मिलना चाहिए.. उसने कहा।
क्या सच? मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा है, क्या आप सच कह रहे हो?.. आश्चर्य से सोहम ने उसको पुनः सवाल किया।
हाँ, बिल्कुल और आपको कल ही हमारे ऑफिस में आना होगा, हमारे स्टुडियो का पता आपको दो घंटे में दिया जायेगा.. इतना कहकर उसने फोन कट कर दिया।
ये खबर सुनते ही निराश और हताश सोहम का दिल आसमां को छूने लगा। सारा शोक और दु: ख अचानक आनंद में परिवर्तित हो सारा वातावरण गुंजायमान हो आया। अब ना उसे ऊबाउ सा लगता ना उसे बुरे ख्याल आते क्योंकि उसका सपना पूरा होने जो जा रहा था। लेकिन पिता का ख्याल आते ही वह उदास हो गया। आसमान से सीधा धरती पर आ गया जहाँ सिर्फ हकीकत थी जो उसे अंदर से बराबर कचोटती रहती, उसे तो सिर्फ वह जिंदगी पता थी जो कल्पनाओं की उड़ान भरती है। ख्वाबों की दुनिया तो सिर्फ सोचने तक सीमित है जिससे आनंद तो प्राप्त हो जाता है किंतु गुजारा नहीं हो सकता। काश! मेरे पिताजी को मेरी ये कला पसंद होती तो मैं स्वयं ये खुशखबरी सुनाता। भय के कारण सोहम ये बात किसी को नहीं बता सकता ना पिता को ना माँ को। एक व्यक्ति था जिसे अपने सुख - दुःख की सारी बातें बिना किसी चिंता के कह सकता है और वह कोई और नहीं उसका परममित्र पूरन।
जब खुशखबरी पूरन की बताई तो वह झूमने लगा और मेरा दोस्त अब गायक होगा, बड़ी- बड़ी फिल्मों में तेरी आवाज गूंजेगी। कहते- कहते सारा घर सर पर उठा लिया और रह - रहकर सोहम को अपने कंधे पर उठाकर नाचने लगा।
तुम तो बहुत किस्मतवालें हो दोस्त बहुत जल्दी तुम्हें मौका मिल गया और वह भी इतनी बड़ी जगह पर.. खुश होते हुए पूरन ने बधाई दी।
मगर।
क्या अगर- मगर, अब कुछ नहीं तू जा रहा है और कुछ नहीं, मैं हूँ न सब हो जाएगा.. पूरन उसकी चिंता जान गया तो विश्वास दिलाते हुए उसे कठोरता से कहा।
पूरन का विश्वास ही उसके लिए जीत थी और वह दोनों हंसते रहे बहुत देर तक। कुछ वक्त बाद बाहर जाकर उन्होंने यह खुशी एक- दूसरे में बांटी। आज घर पर कोई नहीं था तो उसे पूर्ण रूप से आजादी थी जिसका पूरा फायदा उठाया।
६
सोहम अब रोज गाने के लिए जाता, सुबह कॉलेज के बाद गाना गाने वह जाने लगा। वह हमेशा अपनी धुन बजाता और नयी - नयी खोज करता रहता, उसकी इस जिज्ञासा को देखकर वरिष्ठ गायक ने उसे अपना शिष्य स्वीकार कर लिया। यह उपलब्धि सोहम के लिए बहुत अहमियत रखती है। उसके दिन इस तरह पलटेंगे और वह कभी अपने सपने साकार कर पाएगा यह विश्वास उसे कम ही था, किन्तु नियति हमें सबकुछ देती है बस हमें सब्र रखना जरूरी होता है। आज सारी दुनिया की खुशियाँ कदमों में थी उसने जो सोचा वह पाया यही उसकी एक मात्र खुशी थी। लेकिन इस सबके बावजूद वह निराश हो जाता जब उसके सामने पिता का चेहरा आ जाता।
एक दिन नये गाने के बोल तैयार कर रहा था तो माँ उसके सामने अचानक से आ गई और पूछने लगी, क्यों रे सोहम आजकल बड़े खुश नजर आ रहे हो, बात क्या है?
कुछ नहीं माॅं ऐसे ही, मैं तो हमेशा ऐसे ही रहता हूँ.. सोहम ने बात को टालने की कोशिश करी और गुनगुनाता हुआ बाहर जाने लगा।
बता बात क्या है? माँ हूँ मैं तेरी मैं तुम्हें अच्छे से जानती हूँ, बता कौनसी बात है जो तुम छिपा रहे हो.. लता ने उसे जबरन पूछा।
सोहम अब कुछ छुपा नहीं सकता था, वह पकड़ा गया था तो उसने भी अपनी माँ को सारी बात बता दी।
सोहम के मुख से गाना गाने की बात सुनकर लता आगबबूला हो गई, उसपर गुस्सा होने लगी। लता ने कहा, तुम मूर्ख हो गये हो जो तुम गाना गाने की बात करते हो, क्या मिलेगा तुम्हें गाना गाने से। ये हमें बिल्कुल भी सही नहीं लगता कि हमारा बेटा गाना गाते हुए जीवन गुजारे। आने दो तुम्हारे पापा को वह तुम्हें बराबर सबक सिखायेंगे.. लता का पारा गरम हो गया था।
माँ.. माँ.. ऐसा मत करना, मेरा मन तो सिर्फ गाना गाने में लगता है तुम तो जानती हो यह संगीत, गीत और रियाज ही मेरी दुनिया है। इसके बिना मैं अधूरा है और मेरी दुनिया भी.. गिड़गड़ाते हुए लता के चरणों पर आकर सोहम ने कहा।
बेटा, मैंने तो तुझे इसकी छूट इसलिए दी कि तू शौक पूरा करें पर तू तो इसी को जिंदगी मान बैठा। मैं तुम्हारे लिए सारी कायनात से लड़ सकती हूँ पर तुम्हारे पिता से नहीं क्योंकि मैं अपने ईश्वर तुल्य पति के खिलाफ नहीं जा सकती.. धीरे- धीरे अपने हाथ उसके बालों में सहलाते हुए वह कहने लगी। कुछ देर बाद लता ने अपने हाथों से उसे उठाते हुए कहा, तुम मेरे बेटे हो प्यार करते हो न मुझसे।
सोहम ने हाॅं में सिर हिलाया।
मानोगे न मेरी बात।
हं!
सुनो बेटा, आज तक जो भी हुआ सो हुआ पर आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए।
लेकिन माँ?
बस एक शब्द और नहीं, तुम आज से सबकुछ बंद करोगे, बंद मतलब बंद.. लता ने हुक्म सुना दिया।
सोहम ने सिर्फ हाॅं में सिर हिला दिया, माँ का रौद्र रूप देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई।
सारा वातावरण शोकमय हो गया, उसका सुख एक - दो महीने तक ही सीमित रहा। अब वो ज्यादा चुप और उखड़ा- उखड़ा ही रहता। अब वो किसीसे कुछ ज्यादा बात नहीं करता और अकेला ही रहता, पूरन से भी वह पल भर के लिए मिलता और चले जाता। उसका यूँ अचानक गायकी से छुट्टी लेना सब के लिए चोट थी, उसकी कमी बहुत ज्यादा खलने लगी क्योंकि उसके आवाज जैसा कोई अन्य व्यक्ति न था।
किरण जुनेजा जी से जब सोहम के चले जाने की बात हुई तो वह भी चिंता में रहने लगे। एक समय उन्हें भी लगा कि सोहम यूँ अचानक से दूर जाने का मतलब है एक बहुमूल्य हिरे को खो देना। वह एक असाधारण शक्ति का स्वामी, आवाज का जादूगर और न जाने क्या- क्या है?
एक दिन वह अपनी बेटी से इस बारे में चर्चा कर रहे थे, तो उसने आश्वासन दिया कि पापा भले कुछ भी हो जाये पर मैं उसे जरूर वापस लाऊँगी। निहारिका के इन शब्दों ने किरण के मन में आशा की नई किरण जगा दी। वे अब निश्चिन्त थे।
७
सोहम से मिलकर निहारिका ने इस विषय पर चर्चा की किंतु वह असफल रही। अपने पिता की ही खुशी में उसका आनंद है, वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता था जिसे अपने पिता को दु: ख पहुंचे। निहारिका की एक न चली उसके सामने।
निहारिका हार मानने वाली नहीं थी, वो हर हाल में सोहम को अपने सही राह पर लाना चाहती थी। जब सुबह सोहम कॉलेज के लिए जाता है उसी वक्त पूरन की सहायता से वह सोहम के घर पहुँच गई।
नमस्ते आंटी जी, मैं निहारिका मैं आपसे सोहम के बारे में चर्चा करने आयी हूँ.. निहारिका ने आते संग ही अपना परिचय और अपना उद्देश्य बताया।
हा, बोलो बेटी अंदर आओ.. लता ने उसे अंदर बिठाया और उसके लिए चाय - नाश्ता लेने अंदर चली आयी।
निहारिका कुछ देर तक घर को निहारने लगी, वह सारा घर बारीकी से देखने की कोशिश कर रही थी। पूरे मकान को अपने ऑंखों में कैद करना चाहती थी ताकि उसे अपना जीवन तो यही बिताना है। परिवार चाहे उनकी एहसियत का नहीं पर लड़का बहुत चातुर्यवान, समझदार और नेक है। यही आदर्श जीवन को अधिक सहज और आत्मनिर्भर बनाने में मददगार साबित होते है, यह वह अच्छी तरह से जानती है। वैसे सोहम कितना प्रतिभावान है, उससे जो विवाह करेगा वह तो भाग्यशाली ही होगा।
ये लो बेटी चाय, वैसे तुम सोहम के क्लास में पढ़ती हो क्या? .. लता ने मेज पर चाय की प्याली और कुछ बिस्किट रखते हुए पूछा।
नहीं, मैं तो आपके बेटे सोहम की प्रतिभा के बारे में बात करने आयी हूँ। आंटी जी उसे गायकी से दूर मत करें, वह जितना अच्छा एक लड़का है उससे कई गुना बेहतर एक गायक फिर आप क्यों उसे दूर करना चाह रही हो।
हाँ, तो यह बात है तुम सोहम की वकालत करने आईं हो तो यहाँ से चली जाओ, मुझे नहीं भेजना तो तुम कौन होती हो मेरे बेटे के भविष्य के बारे में बात करने वाली.. फटकार सुनाते हुए कुछ बड़ी आवाज में कहा।
मैं कौन होती हूँ उसका हित और अहित सोचने वाली, पर मैं कोशिश तो कर ही सकती हूँ और मैं ऐसे प्रतिभावान व्यक्ति को मरता हुआ नहीं देख सकती.. कुर्सी से उठते हुए वह बोली।
ये लड़की तुम मुझे मत समझाओ मैं तुम लोगों के बारे में बहुत अच्छी तरह जानती हूँ, जो पैसों के खातिर कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हो और मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा इस दलदल में फंसे.. लता ने जो सुना और देखा था उस पेशे के बारे में वह साफ - साफ कह दिया।
नहीं, आप गलत समझती हो, अक्सर ऐसी खबरें आती होगी पर जितना आप समझती हो उतना घटिया नहीं है यह क्षेत्र। माना कि बुरे लोग होते हैं लेकिन अच्छे लोग भी वहाँ है तो आप कुछ गिने - चुने लोगों के कारण पूरे क्षेत्र को तो गलत तो साबित नहीं कर सकती ना.. निहारिका ने समझाते हुए कहा।
मुझे विश्वास नहीं, मैं कभी नहीं भेज सकती.. जोर से लता ने कहा।
तो यह बात भी समझ लेना अगर भविष्य में वह कामयाब न हो सका तो इसकी जिम्मेदार सिर्फ आप रहेगी.. यह कहर निहारिका बाहर निकल गई।
लता उसे कुछ नहीं कह सकी बस उसे जाते देखती रही।
क्या मैं सही हूँ? जो सोहम को उसकी चाहत से दूर कर रही हूँ, नहीं वह नहीं जान सकता कि जिस राह पर ये जा रहा है, उसके कारण कितनी तकलीफ सहनी पड़ी है उसके पापा को। मगर क्या यह सच है कि एक दफा हुईं घटना बार - बार हो सकती है, अगर ऐसा ही रहा तो बाकी बचे हुए लोग भी वापस आ जाते। क्या उस क्षेत्र से जुड़ा हर व्यक्ति बुरा होता होगा, मेरा बेटा तो ऐसा नहीं। मुझे तो उस पर पूरा विश्वास है फिर भी मेरा मन न जाने क्यों उसे बार- बार रोक रहा है। दिल तो अभी यही चाहता है कि वह कुछ बड़ा करें, मगर उसकी राह क्यों गलत लगती है? यह लड़की जो कह गयी है, वह समझती हूँ किंतु पत्नी धर्म का क्या? नहीं मैं अपने पति से तो दो बुरे शब्द सुन सकती हूँ मगर अपने पुत्र से भविष्य में कुछ सुनने का साहस नहीं जुटा सकती और मैं माँ हुई तो क्या बच्चों के भविष्य में अडंगा तो नहीं डाल सकती न। उसका जीवन तो मैं नहीं निर्धारित कर सकती। उसे स्वयं के फैसले स्वयं लेने चाहिए।
दरवाजे की घंटी बजी तो लता खयालों से बाहर आयी। सोहम आकर अपने कमरे में चला गया। जब कुछ देर बाद लता उसके कमरे की तरफ बढ़ी तो उसने देखा कि वह कुछ गुनगुना रहा था।
लता ने उसे आवाज दी तो उसने अपने शब्द अंदर ले लिए और पढ़ने का ढंग करने लगा। यह देखकर लता को आत्मग्लानि का अनुभव हुआ।
बेटे सोहम इधर आ, ऐसा कभी मत करना। तुम अपने अंदर के गायक को हमारी वजह से नहीं मार सकता, तुझे पसंद है तो तू गा। मैं अब तुम्हें कभी नहीं रोकूँगी.. उसे अपनी बाहों में लेकर लता ने कहा और आवाज भी दबी- दबी सी निकल रही थी, कुछ आंसू भी गिर पड़े।
माँ का यह रूप देखकर सोहम दंग था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था तो उसने पूछा, क्या सच में माँ? लेकिन पापा?
तुम चिंता मत करो मैं उन्हें समझा दूंगी.. माँ ने आश्वस्त किया।
माँ की बात सुनकर वह उछलते हुए बार अपनी माँ से बिलगने लगा। यह खुशी लता को अंदर से सुख दे रही थी। कहते हैं न जब बच्चे खुश होते हैं तो उससे सुख ज्यादा माँ को होता है। वही अनुभूति लता को इस वक्त हो रही थी।
८
माँ का आश्वासन और साथ पाकर सोहम बहुत अधिक आनंदित हुआ। वह अपने सपने को पूरा करने के लिए पूरी तरह से तैयार था। वह काॅलेज के बाद गाना गाने के लिए जाने लगा। अब घर में भी वह पहले से अधिक खुश रहने लगा मगर पिता की नजरों से दूर ही। वह कभी नहीं चाहता था कि पापा को मैं जो कर रहा हूँ उसकी जरा - सी भी भनक पड़े, अगर ऐसा कुछ हुआ तो उसका नतीजा बहुत बुरा होगा। वह अपने पापा से बहुत डरता था।
एक दिन गाने की रिहर्सल हो रही थी, तभी न जाने कहाँ से उसके पापा वहाँ पहुँच गए, जब अपने पापा को देखा तो गीत के बोल गले में अटक गए।
क्या हुआ सोहम? अचानक क्यों रूकें? तुम अच्छे से गा रहे थे.. सर ने आवाज दी।
वह बस अपने पापा की ओर देखकर नजरें नीची कर खड़ा रहा। उसके पिता गुस्से से लाल - पिले होकर उसे वहाँ से निकाल कर लाये। बाकी लोग कुछ न कर सके सिवाय एक- दूसरे की तरफ देखने के।
घर पहुँचते ही सोहम के पापा उसपर गरज पड़े और हाथों में बेल्ट लिए जब उसे मारने लगे तो उसके संरक्षण में लता आयी।
नहीं, मेरे होते हुए आप मेरे बेटे को नहीं मार सकते हो.. अपनी पूरी शक्ति से जोर से आवाज निकाली।
तुम नहीं जानती कि इसने आज क्या किया है?
मैं सब जानती हूँ कि ये गाना गाने के लिए जाता है.. लता ने कहा।
लता के मुंह से यह बात सुनकर अपने आप ही हाथों से बेल्ट नीचे गिर गया।
वे कहने लगे, तुम जानकर भी अनजान रही और मुझसे भी छुपाया।
तो क्या करती? अगर तुम्हें बता देती तो जाने देते इसे? और मैं कभी नहीं चाहती कि मेरा बच्चे आपके कारण अपनी प्रतिभा को मार डाले.. भर्रायी आवाज से लता ने कहा।
मगर, तुम तो सच जानती थी और मैं नहीं चाहता कि जो चोट मुझे लगी वो इसे लगे.. अपने साथ हुई घटना की याद दिलाते हुए कहा।
आप ऐसा क्यों सोचते हो कि जो आपके साथ हुआ वो सोहम के बारे में भी होगा, आप भूलते क्यों नहीं? ये सोचिए कि आपके ही गुण आपके लड़के में आये है तो उसे पूरा कराने में आपको मदद करनी चाहिए.. लता ने समझाते हुए कहा।
बेटे सोहम जरा इधर आओ, मैं गलत था मुझे माफ कर दे.. बिलगते हुए रोते- रोते कहने लगे। मेरा बेटा बनेगा न सफल गायक, बनेगा न.. सोहम को पूछने लगे।
हाँ, पापा हा.. पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा।
तीनों ने हंसी- खुशी के साथ एकसाथ भोजन किया और हंसते- गाते हुए चांदनी रात में सो गये।
अगले दिन एक पूरे आत्मविश्वास और निडरता के साथ सोहम गाने लगा। उसकी आवाज सुनकर सभी लोग बहुत प्रभावित हुए। उसकी कला दिनों दिन और निखरती चली गई। वह अपने साथ पूरन को भी ले आता मगर आज वह अकेला आया था। आज थोड़ा जल्दी निकल आया क्योंकि उसके दोस्त को खुशखबरी जो सुनानी थी ।
पूरन, मैं आज बहुत खुश हूँ। अगर तुम्हारा साथ न होता तो मैं यह जीत शायद ही हासिल कर पाता, तुम्हारे साथ के कारण ही आज मैं खुश हूँ .. उल्लसित भाव से सोहम ने कहा।
नहीं, मेरे दोस्त मैं तो सिर्फ निमित्त था। अगर निहारिका न होती तो शायद तुम्हारी माँ तुम्हारा साथ दे पाती.. पूरन ने सच्चाई कही।
क्या सच?
हाँ भाई उसके समझाने के कारण ही तो तुम्हारी माँ ने तुम्हारा साथ दिया ।
लेकिन क्यों?
मैं यह तो नहीं जानता लेकिन तुम्हारी जीत की असली हकदार तो वही है.. पूरन ने कहा।
चलो हम उसे मिलकर आते है.. सोहम ने पूरन को अपने साथ आने का आग्रह किया।
नहीं तुम हो आओ मैं नहीं आ सकता.. पूरन ने मना किया तो सोहम अकेला निकल पड़ा।
९
सोहम निहारिका को मिलने जैसे ही उसके घर पहुँचा तो वह अवाक् देखता ही रहा। वह पहले कभी इतने बड़े मकान में नहीं गया था। तीन चार नौकर थे जो उनकी सेवा में हर समय मौजूद रहते है। बाहर बरामदे में तरह - तरह के फूलों की सुगंध से सारा घर हर समय प्रफुल्लित रहता है। यह एक ख्वाब सा था शायद उससे भी कुछ बड़ा जिसकी कल्पना करना भी असंभव था। नौकरों से पता चला कि वह अपने कमरे में है तो वह कमरे की ओर बढ़ा। जितना सोहम का मकान था, उतना तो निहारिका का कमरा था। जिसमें चारों तरफ सिर्फ सोहम की तस्वीरें लगी हुई थी और वह उन तस्वीरों के साथ बोल रही थी, और कितने दिन सोहम मैं अब नहीं कर सकती। तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी अधूरी है, अब कोई देरी नहीं।
ये सब क्या है निहारिका ?.. कुछ असमंजस भाव मुख पर लिए प्रश्न किया।
कुछ भी तो नहीं। जो तुम देख रहे हो वह मेरी चाहत और आज जो सामने खड़ा है वह सच्चा हमसफ़र, बस इतना ही.. मुस्कुराहट के साथ निहारिका बोली।
ये नहीं हो सकता, हम बराबर के नहीं। हमारा और तुम्हारा मिलन असंभव है क्योंकि मैं किसी और को चाहता हूँ, काश! मैं तुम्हें उसे मिला सकता। वह कहीं गुम हो गई, मैं उसे कितने सालों से खोज रहा हूँ लेकिन वह नहीं मिल सकती।
तो आज मिल लो उससे क्योंकि वह मैं ही हूँ जिसकी तुम्हें तलाश है.. निहारिका ने कुछ गंभीर और हास्य से कहा।
क्या बेहूदा मजाक है यह? मैं तो तुम्हें धन्यवाद कहने आया था पर तुम तो पागल हो गई हो.. कहते हुए सोहम बाहर निकलने लगा।
मि. सोहम ठहर जाओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ.. निहारिका ने अलमारी खोली जिसे देख सोहम के होश उड़ गए।
ये तुम्हारे पास कैसे आया ये तो मेरी निम्मी का है, क्या तुम ही मेरी निम्मी हो.. आश्चर्य के भाव लिए वह निहारिका को घूर रहा था।
हाँ, सोहम मैं ही तुम्हारी निम्मी हूँ। वो अल्हड़, नटखट और चुलबुली। मैं जब तुम्हारे घर पर आयी तभी मैंने इस शीशी का आधा हिस्सा तुम्हारे यहाँ देखा, मगर मुझे विश्वास नहीं हुआ कि हमारी यह मुलाकात इस तरह से होगी.. कहते हुए वो सोहम को लिपट गयी।
वो मेरी निम्मी कहाँ चली गई थी तुम इतनी दूर ! न जाने कितने साल इंतजार किया पर तुम्हें सामने देखकर पहचान नहीं पाया। हाय! यह मुझसे क्या हो गया? शायद मैं तुम्हें जल्दी पहचान जाता पर नियति को हमारा मिलन अब मंजूर था जो आज हुआ.. सालों की कसक और प्यार पाकर सोहम अत्यधिक आनंद का अनुभव कर रहा था।
दोनों ने बहुत सारी बातें की बचपन की वो शरारतों से तंग होते लोग, नादानियां जो कभी हंसा कर जाती तो कभी रूलाती। प्यार का मिलन आज उन्हें सारी खुशियाँ दे गया, इसमें ना ऊंच नीच का आभास रहा ना किसी के रोकने का भय।
उन दोनों ने अपना संसार तो बहुत पहले बना लिया था पर आज उसको पूरा करने दोनों ही तैयार थे।
निहा, यह सब क्या चल रहा है.. जोर से सविता ने आवाज लगायी।
उसकी आवाज सुनकर दोनों सुन्न हो गये।
माँ, यह मेरा दोस्त है मैंने नहीं कहा था कि ये गाना बहुत बढ़िया गाता है और हमारी अगली फिल्म में भी यही गा रहा है.. निहारिका ने सहज होते हुए कहा।
हा, हा अच्छा तो यह है तुम्हारे पापा रोज इसी की तारीफ करते है, लेकिन तुम्हारा यह बांहों में पकड़ना मुझे समझ में नहीं आया।
माँ, मैंने नहीं कहा था कि मेरी एक अधूरी चीज किसी के पास रखी है और मुझे वह अमानत आज मिल गई।
मैं कुछ समझी नहीं.. अचरज से सविता ने कहा।
माँ, आप तो शहर आकर गाँव को तो भूल ही गयी। ये सोहम कोई और नहीं बल्कि लता मौसी का लड़का है और मेरा बचपन का मित्र.. निहारिका ने स्पष्टता से कहा।
सच बेटी, यह कितना बदल गया है। बेटे तुम्हारी माँ कैसी है? और तुम्हारे पापा? इतने सालों बाद भी हम एक शहर में रहते हुए मिल न पाये शायद इसकी वजह हमारे रिश्तों की अनबन हो। तुम्हारे साथ मेरी बेटी का विवाह कर देने से सारे गिले - शिकवे मिट सकते हैं, मुझे तुम्हारी माँ के पास ले चलो बेटा.. सविता ने आग्रह किया।
हाँ, जरूर आप हमारे साथ हो इसकी खुशी हुई धन्यवाद माँ.. प्रणाम करते हुए सोहम बोला।
कोई बात नहीं बेटा, यह तो खुशी की बात है .. इतना कहकर वो तीनों सोहम के घर की ओर चल पड़े।
१०
माँ.. माँ.. देखो तो आपसे मिलने कौन आया है.. बाहर से ही सोहम ने अपनी माँ को आवाज दी।
लता ने आकर देखा तो सामने सविता को खड़े देख उसके आंसू उमड़ पड़े। सालों से जुदा हुई ये बहनें आज मिल रही है। सारा घटनाक्रम उसे याद आया।
आज तीस से अधिक बरस हो गये थे उन दोनों को मिलने के लिए। परिवार की स्थिति कमजोर होने के कारण रिश्तों में बिखराव आ गया जिसके चलते इतने सालों का दु: ख उन्हें सहना पड़ा। गाँव में तो आस - पड़ोस में रहते हुए उनके बीच घनी मित्रता रही जो उनके बच्चों में भी पनपती गयी। आज उनकी ही दोस्ती के कारण इन दो परिवारों के बीच की दूरियां मिटाने को अग्रसर थी। गाँव में आस - पड़ोस में रहने वाली यह औरतें एक ही शहर में कोसों दूर रहे थे, जो दूरियाँ उनके बीच थी वह आज दूर हो गई और वे दोनों ही एक सुखद अनुभव करने लगे।
उनके बीच जो गिले - शिकवे रहे वो अब पूरी ह मिट गये, वे दोनों ने आपसी तनातनी को दूर रखना उचित समझा। अपने- अपने पतियों को एक जगह बुला लिया और उन्हें उचित समझाया। उनके बीच बना हुआ मनमुटाव और एक- दूसरे के प्रति रहा दुराग्रह को दूर करना ही उचित था। परिवार के बीच संधि भी हुई और साथ ही बच्चों की शादी भी।
उन दोनों के मिलन से सारे दु: ख, पीड़ा और अंधेरे को एक नया रास्ता मिल चुका जो एक आशा, एक उमंग और उल्लास , हर्ष से भरा- पूरा वातावरण तैयार हो गया। आपसी रंजिश के पुनर्मिलन का कार्य आज बच्चों के कारण सफल रहा। दोनों परिवार अब साथ - साथ रहने लगे।
सोहम और निहारिका ने अपने जीवन का सफर शुरू किया। सोहम की आवाज ने दुनियाभर में धूम मचा दी। सोहम इसका सारा श्रेय निहारिका और अपनी माँ लता को जिसके विद्रोह के कारण आज सोहम अपना स्वप्न पूरा कर सका। उसके जीवन में अगर निहारिका न होती तो शायद ही वह यह मुकाम हासिल कर पाता। आज उसके लिए निहारिका एक गुरु के समान थी। वह अपनी जिंदगी में किसी की कमी महसूस कर सकता लेकिन निहारिका की नहीं ।
।।समाप्त।।
- मंथन विनायक देवरे " हिम "