भाग ३७
यश की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था! न क्षितिज रेखा की सीमा न अम्बर-धरा का बन्धन! उसकी आशाएं समंदर की उछलती लहरों सी नई-नई ऊँचाईयां छूँ रही थी! क्रिसमस में गिरिजाघर में जगमगाती मोमबत्तियों की तरह उसके मन की धरा पर असंख्य मिट्टी के दीप जगमगा रहे थे। आज उसके लाडले प्रशिक्षक ने उसे और वैदेही को चाय पर बुलाया था!। अपने प्रशिक्षक के अंतस में अपनी जगह बनाना किसी दुर्गम चोटी को सर करने जितना ही मुश्किल कार्य होता है!
विचारों की लड़ियों में उलझे धागे सुलझाते-सुलझाते वह भूल गया कि समय किसी का इंतज़ार नहीं करता भले ही वह विभा का इंतज़ार जरूर कर रहा था!
तभी मोबाइल की रिंग टोन बजी! वज्र का फोन था! वैदेही भी साथ में ही थी! दोनों ने यश और विभा के लिए 'ऑल द बेस्ट' कहा और 'रात को मिलते हैं' कह कर फोन रख दिया।
इसी बीच दरवाज़े की घंटी बजी और विभा ने बुके यश के हाथ में दिया और दोनों चल पड़े नितीन सर के घर की ऒर! 'ओला' हवा से बातें कर रही थी और यश और विभा सुप्त ज्वालामुखी से खामोश! दोनों अपने-अपने मन के घोड़े दौड़ा रहे थे और भविष्य टोह लेने का प्रयास कर रहे थे। आखिर सर ने उन्हें घर पर क्यों बुलाया? कॉलेज में भी तो बात कर सकते थे सर!
यश और विभा आपस में इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे तभी सर का घर आ गया। यश ने पहले ही ऑनलाइन पेमेंट कर दिया था! यश सर के लिए चाँदी का सिक्का ले कर आया था और विभा बुके!
द्वार पर लगी बेल बजते ही एक गीत का मुखड़ा सुनाई देने लगा ... 'हम होंगे कामयाब..., हम होंगे कामयाब...एक दिन...मन में हैं विश्वास....' नितीन सर ने दरवाजा खोला! दोनों ने उनके पैर छुएं और सर का इशारा पाते ही दोनों सोफा पर बैठ गएँ! तभी नितीन जी की माताजी पानी के ग्लास लेकर आई तो विभा ने उठ कर उनके हाथ से ट्रे ली। उसने सबको पानी के ग्लास थमा दिएँ और माताजी को प्रणाम कर वह सोफे पर बैठ गई! यश भी उनका चरणस्पर्श कर सोफे पर विराजमान हो गया ।
विभा ने सर को फूलों का गुलदस्ता भेंट दिया और यश ने चाँदी के सिक्के की डिबिया! सर ने ना-नुकुर कर अंत में युवाओं की भावना का सम्मान रखते हुएँ दोनों चीजे स्वीकार कर ली!
अब वक़्त था चाय-नाश्ते का! सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद नितीन सर मुख्य बात पर आयें।
"यश! जो भी मैं पूछूँ, उसका खुल कर, दिल-दिमाग़ से सोच-समझ कर जबाब देना!
यश! खेल के प्रति तुम्हारी दीवानगी देख मैंने तुम्हें मिलने के लिए बुलाया! तुम्हारी खासियतें, कमजोरियों से मैं अच्छी तरह से वाकिब हूं! तुम और विभा पांच साल से मुझ से प्रशिक्षण ले रहे हो! मेरे अंतस में सुवर्ण अक्षरों से लिखें गएँ कई पलों में से ज्यादातर पलों में तुम दोनों ही मौजूद हो! तुम्हारी ज़िद, जीवट, जज्बे से मैं परिचित हूं!
यश! आप दोनों की ज़िन्दगी की एक दुर्घटना के बाद हालात बदल गये हैं। इस सच्चाई को हम सबको चाह कर या न चाह कर भी स्वीकारना ही होगा!
"विभा! क्या तुम भी खेल को जारी रखना चाहोगी? राज्यस्तरीय खिलाडी हो दोनों! दोनों की काबिलियत, हुनर पर मेरे मन में कोई शंका नहीं हैं! मुझें पूरा विश्वास हैं तुम दोनों मेरे भरोसे को टूटने नहीं दोगे लेकिन...
तभी दोनों एक साथ बोल पड़े, " लेकिन क्या सर? कुछ छुपाना मत सर! हम बड़े से बड़े झटके को प्रघात अवशोषक सा सहन करने के लिए सक्षम हैं सर!"
यंग ब्रिगेड! मैं जानता हूं! तभी तो मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया है! अब तुम दोनों का लक्ष्य समान होगा लेकिन रास्ते अलग-अलग होंगे! मंजिल पर नज़र दोनों को गडाएँ रखनी होगी लेकिन मुश्किलें अलग-अलग होगी।
यश! मैं तुम्हारे घाँव पर नमक छिड़कना नहीं चाहता हूं मैं बल्कि वक़्त को चुनौती दे कर विश्व में अपने देश का, अपने शिक्षण संस्थान का, अपना नाम रोशन करने के लिए रोशनी से जगमगाता रास्ता दिखाना चाहता हूं तुम्हें!
यश! तुम्हें चट्टानों से भिड़ना, उन्हें चुनौती देना अच्छा लगता है न? मैंने जो लक्ष्य तुम्हारे लिए चूना है, उसके लिए तुम्हें खूब पसीना बहाना पड़ेगा, दर्द सहना होगा, धैर्य की हर पल परीक्षा देनी होगी और तुम्हें चुनौतियों का दर्या पार कर कश्ती को किनारे तक ले जाना होगा!
"सर! कैसे धन्यवाद करूँ आपका?"
आपने मेरे मन की बात कहीं! आपका सही दिशा-निर्देश तथा मार्गदर्शन मुझें जरूर लक्ष्य तक पहुंचाएगा! सर मैं जानता हूं! मुझें अर्जुन सा मत्स्य-नेत्र-सन्धान पर ध्यान केंद्रित करना होगा! मेहनत तथा कठोर तपस्या कर खेल में महारत हासिल करनी होगी! मैं तैयार हूं सर! बड़ी से बड़ी कुर्बानी के लिए! जी-तोड़ मेहनत के लिए! प्लीज सर! मुझें आशीर्वाद दीजिये! यश को भावुक होता देख़ नितीन जी ने उसे गले से लगाया और उसकी पीठ थपथपाई।
"यश! तुम किस्मत वाले हो! 2020 के तोकियो पैरालिम्पिक में बैडमिंटन को शामिल किया गया है।मेरे एक मित्र हैं! गौरव खन्ना! जानते हो उनकी लखनऊ में
स्पोर्टस अकादमी हैं! वहाँ पैरालिंपिक बैडमिंटन के खिलाडियों को उनकी परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं के अनुसार अभ्यास करा कर, उन्हें सुविधा तथा प्रशिक्षण दे कर, उन्हें जरुरी संसाधन उपलब्ध करा कर विश्व स्तरीय कोचिंग दी जाती हैं! तोकियो पैरालिंपिक में इसी संस्थान के खिलाडियों ने चार मेडल जीते थे! मैं उनसे बात करूँ न?"
"हाँ सर! जरूर! ऐसा मौका कब मिलेगा? "
जहाँ तक मुझें जानकारी हैं, महीने के हर रविवार को वहाँ प्रतिभा की खोज की जाती हैं! जिन्हें खुद में विश्वास हैं, स्वेद बहाने से परहेज नहीं हैं, जो दृढ़ निश्चयी हैं और जो दर्द को जज़्ब करने का भी हुनर जानते हैं उनके लिए यह अकादमी सर्वोत्तम हैं। इस अकादमी ने न जानें कितने ऐसे चोटी के खिलाडी दिए जिन्होंने विभिन्न विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में देश का नाम रोशन किया!
विभा यश जानते हो? इस पूर्व खिलाडी को पद्मश्री और द्रोणाचार्य अवार्ड भी मिला हुआ हैं! वह खुद भी एक नामी-गिरामी पूर्व पैरालिंपिक बैडमिंटन खिलाडी हैं! यश! हैं न गौरव और गर्व की बात?
अब तक विभा ने पलकों में बड़ी मुश्किल से संभाल रक्खे मोती अनायास ही बिखर चुके थे! कुछ पल के लिए यश भी विभा को देख भावुक हो गया था लेकिन उसने खुद पर नियंत्रण रक्खा!
शुभ, मंगलमय कार्य की शुरुआत आज और अभी से करनी चाहिए न! उसने विभा के कन्धे पर हाथ रख कर उसे सांत्वना दी।
नितीन सर ने दोनों को प्रैक्टिस जारी रखने का सुझाव दिया और आगे की सूचनाएं व्हाट्सऐप पर एक ग्रुप में देने की बात कही और संगोष्टी समाप्त हो गई! दोनों सर के चरण छूँ कर निकल पड़े अपने घर की ऒर...
एक ऒर दोनों की आँखों में उम्मीदों भरा नीला आसमान था तो दूसरी ओर भविष्य में एक-दूजे से बिछड़ने का गम!
विभा का मन पेंडुलम की तरह यहाँ-वहाँ हो रहा था लेकिन दोनों की नज़र एक ही लक्ष्य पर केंद्रित थी! खेल में देश का प्रतिनिधित्व करना... पोडियम पर खड़े रह कर राष्ट्रगीत की धुन के साथ तिरंगे का उर्ध्व-रोहण देखना और अपने गुलाबी अधरों से मेडल को चूमना....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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