अंतस पट...

शीर्षक : अंतस पट...

||1||

कानन-कानन बिखरें विवश सुमन,

माली को तरसे श्यामल सजल नयन!

सूर्योदय हो या अस्ताचल की ओर गमन,

ममतामई स्पर्श को वंचित वन-उपवन!

||2||

वृक्ष-वल्लरियों का व्योम-विलाप-वर्जना,

ऋतु परिवर्तन में जीवन-संघर्ष-अर्चना!

खाद-पानी द्वारा जीवन-सिंचन-कल्पना,

व्यर्थ की अभिलाषा, आक्रोश-गर्जना!

||3||

अन्न-पानी हेतु देश-विदेश भटके ख़ग गण,

सरवर तट प्रवासी पक्षियों का आवागमन!

जलाशय निकट ही प्रस्तावित स्नेहमिलन,

संयुक्त परिवार का मन मोहक सम्मेलन!

||4||

परिवार-श्रेष्ठी करे रिद्धि-सिद्धि संवर्धन,

माली की भाँति पाल-पोस करे श्री वर्धन!

कर्मयोगी की जड़े गहरी करें सही सृजन,

त्याग, बलिदान महत्ता समझाएँ श्रेष्ठीजन!

||5||

उपवन का माली जाने बुजुर्गों का मोल,

वर्षा-ताप-शीत सहने का मन्त्र दे अनमोल!

अनुभव के बोल कहे तोल-मोल के बोल!

धैर्य-एकता-साहस कहे अन्तस पट खोल|

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |

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