कुण्डलियाँ छंद कुण्डलिया छंद!

रघुवर का कर जाप तू , देता मन को शक्ति।
पुरुषोत्तम प्रभु राम की, जन-जन करते भक्ति।
जन-जन करते भक्ति, दर्श पा होते भावुक।
कर्म बन्ध को तोड़, जोड़ता नाता नाजुक।
सकल सत्कार-मान, मिले जो गुरु के अनुचर।
कृपा-दृष्टि सन्मान, मिले जो ध्याते रघुवर।।

सकल चढ़ावा था पड़ा, पेटी में जब बंद।
कैसे पापी ने भरें, सिक्के घट में चंद।  
सिक्के घट में चंद, पाप का थामे दामन।
जिनकी मति है कुन्द, भटकता कानन-कानन।
सनातनी का मान, झुका सिर, लज्जित छावा।
डायन मारी सेंध, साफ़ कर सकल चढ़ावा।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

 
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