उलझन... उलझी-उलझी ज़िन्दगी में ,
सवालों के कोलाहल में!
कभी कान्हा की बांसुरी में,
कभी शिव-तांडव में!

वीणा के तार छेड़ती उंगलियाँ,
खुशनुमा बयार में थिरकती कलियाँ!
जलतरंग के सुर-ताल पर,
राग-रागिणी गुनगुनाती कोयलियाँ!

जीवन सुर-ताल का है संगम,
सुख-दुःख, खुशी-गम की सरगम!
जीवन जीवट, जिद्द की है परीक्षा,
सत्य-सत्व, स्नेह-सबूरी की प्रतीक्षा!

मुरली की तान कभी रणभेरी,
कालिंदी तट कभी कुरुक्षेत्र भारी!
जीवन जन्म-मृत्यु के बिच की दूरी,
सुर-लय से सजी कृष्ण-बांसुरी!

स्वरचित और मौलिक
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र 

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