ये प्यार ही तो ज़िन्दगी...भाग ७
भाग ७

वैदेही के तन-मन के घाँव अब भरने लगे थे.. ..
पतझड़ के बाद अब खूंट से पेड़ों पर नन्ही-नन्ही कत्थई कोपलें मुस्कुरा रही थी... आँगन की रातरानी महक रही थी.. उसकी सुगंध बीते दिनों की याद ताज़ा कर रही थी...
अब तक ज़िन्दगी की गाड़ी उबड़-खाबड़ रास्तोंपर दौड़ने की अभ्यस्त हो चुकी थी...वक़्त की मार से ज़िन्दगी की रेल करीने से बिछी पटरी पर सपाट दौड़ना तो मानों भूल गई थी ...
आज सुबह-सुबह आबा ने माँ को फ़ोन कर विनती की थी.... "पोरी! आज पुरण पोळी बनवशील का ग?" वज्र दो दिन से ज़िद पर अड़ा है .. बहुत दिनों बाद पूरा खाना खा रहा है न... मुँह का स्वाद ही बिगड़ गया है...
बुरे समय में आबा का ही तो सहारा था हमें! माँ उनकी बात कैसे टालती? वैदेही को भी तो बहुत पसंद थी पुरण पोळी और आमटी.... आबा तो आई को अन्नपूर्णा ही कहते... आई बनाती ही इतना स्वादिष्ट....
नियत समय पर आबा आएं, टिफिन लिया और एक बड़ा लिफाफा माँ को थमा कर चले गएँ...
माँ ने बहुत मनुहार की लेकिन उन्होंने दो कौर भी पुरण पोळी के नहीं खाएं! कल से जब से उनकी मुलाक़ात विनय के माता पिता से हुई थी वो बहुत अंतरमुख हो गए थे... उन्होंने उनका बहुत ही विनम्रता से अभिवादन किया.. उनकी दर्यादिली के लिए कृतज्ञता व्यक्त की और अपनी गाड़ी में उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (VT) पहुंचाया! आज वज्र अगर जिन्दा था तो उन्हीं की वजह से..उसकी काया में विनय का ही तो ह्रदय धड़क रहा था... हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद से...
विनय का विद्युत दाह गृह में अंतिम संस्कार संपन्न हो चूका था और उसके माता-पिता अपने बेटे को भारी मन से मुखाग्नि दे सिर्फ कुछ दुआओं के साथ नेपाल लौट चुके थे! जाते-जाते वो आबा को उसके रूम में मिली कुछ चीजे थमा कर लौटे थे...विनय के मोबाइल के सिम में मिले कुछ फोटोज भी उन्होंने आबा को व्हाट्सएप्प किए थे! 
माँ की थकान के मारे आँख लग चुकी थी...खाना खा कर वैदेही भी थोड़ी सुस्ताई और उसकी भी आँख लग गई...उसके अवचेतन मन को शान्ति कहाँ थी? गहरी नींद में विनय की यादों ने उसे घेर लिया था! कितना जुनून था उसमें कुछ कर दिखाने का! विभा ने एकांकीका लिखी नहीं कि उसका पहला पाठक हाजिर! कितना गौर से पढ़ता था वो हर एक पंक्ति को मानों मन में एक-एक किरदार को गड़ रहा हो..कला का विद्यार्थी.. हिन्दी भाषा पर पूरी पकड़ थी उसकी! विभा और वो मिलकर किरदारों के संवादों को आम लोगों के लहजे में ढालते ताकि शब्द-शब्द सुनने वालों को जाने-पहचाने से लगे... एक एकांकीका को जीवंत करने के लिए वो तन-मन की पूरी ऊर्जा को झोंक देते... कभी-कभी किसी विषय पर असहमत होते तो एक-दूसरे से बच्चों जैसे भीड़ जाते...तू-तू, मैं-मैं पर उतर आते और अगले ही पल 'दे ताली' कह कर दोनों उछल कर एक-दूजे को ताली दे कर हाथ मिला लेते...कहते हैं न...अंत भला तो सब भला... दोनों कहानी के किरदार को वज्र, वैदेही और यश को ज़ी-जान से समझाकर उस किरदार में जान फूँक देते!
वह अतीत की दुनिया में खोई हुई थी तभी बाहर ढ़ोल-बाजों की आवाज़ से वैदेही और उसकी माँ हड़बड़ाकर उठ गई! 
"वैदेही! उठवायचं न मला..." कह कर माँ स्नानगृह में चली गई और हाथ-मुँह धोकर चाय बनाने में लग गई... तभी दीवार पर टंगी दादाजी के ज़माने की यूनिक घड़ी ने पांच का ठोका दिया और वैदेही खुद का हुलिया सुधारने में लग गई... माँ चाय बनाकर लाती तब तक वैदेही माँ की टेबल को करीने से समेटने-सजाने में लगी रही..तभी उसकी नज़र आबा ने सुबह दिए लिफाफे पर पड़ी..
'कितनी भुल्लकड़ हूँ मैं...' वह मन ही मन में खुद को कोस रही थी तभी माँ को आते देख उसने माँ के हाथ से दोनों मग लिए और पूछ बैठी... माँ क्या हैं इस लिफाफे में? बेटा! तुम खुद ही देख लो इसे खोल कर..माँ की अनुमति मिलते वह लिफाफ़ा खोलने में लग गई... तभी माँ ने टोक दिया... पहले चाय तो पी लो .. यें दो-चार 'नाइस' बिस्किट्स भी ले लेना साथ में .. बाद में देख लेना लिफाफ़ा ...
वह चाय पीने में व्यस्त हो गई... तभी विभा का फ़ोन आया... 
"माँ! अभी आती हूँ" कहकर वह अपने कमरे में चली गई..आज पंद्रह दिन के बाद विभा ने फ़ोन किया था..उसके चेहरे के घाँव अभी कुछ सूखने लगे थे... वह गाड़ी के इंजिन से झुलस गई थी... दोनों ने एक-दूसरे का कुशल-क्षेम पूछा...विभा अब भी साफ बोल नहीं पा रही थी.. उसकी थरथराती आवाज़ से उसका दर्द मुखर हो रहा था! फ़ोन पर भी उसकी पीड़ साफ महसूस हो रही थी.. वैदेही ने उसे व्हाट्सएप्प पर जुड़ने को कहा और फ़ोन रख दिया! यादों की पगदंडी पर चलते-चलते अतीत के अनगिनत शूलों की टीस महसूस होती जो बहुत ही ज्यादा पीड़ादाई थी! विभा उनके ग्रुप की सबसे ज्यादा लावण्यवती, बिनधास्त, शौक़ीन और मेधावी लड़की थी...उसके पिता यशवंत राव जी का भी राजनितिक हलके में अच्छा नाम था...पैसा उसके लिए न तो समस्या थी न मजबूरी! 
वैदेही फिर खयालों में गुम हो गई... 
यह क्या कर दिया भगवान? इस मासूम को इतनी बड़ी सजा किसलिए? कितना वक़्त लगेगा इन गहरे घाँवों को  भरने में? पहले छप्पर फाड़ कर देने और फिर उसे निर्दयता से खींच कर ले जाने का क्या मतलब हैं प्रभु!
आज तो उसने रच्चनहारे से जंग छेड़ दी थी... ऊपरवाला भी तो उसकी सहनशीलता की बार-बार परीक्षा ले रहा था! 
विभा को 'चैट' पर मिलने का वादा कर वह माँ के टेबल की तरफ लौटी...उसने धड़कते दिल से लिफाफ़ा खोला! लिफाफे में दो डायरियाँ थी... वह खोल कर उन्हें पढ़ने लगी! पहले ही पन्ने पर श्री वर्ण के नीचे उनकी मंचित नाटिका के सभी पात्रों की फोटो देख कर उसकी आँखें नम हो गई! उस छायाचित्र में सबकी आँखें हीरे सी चमक रहीं थी... मानों भविष्य के सुन्दर सपने उन आँखों में पल रहें थे.... उसी फोटो के नीचे विनय के कलात्मक हस्ताक्षर और इंद्रधनुषी रंगों में लिखें थे पांच नाम... जैसे फोटो में थे उसी क्रम में... विभा, यश, विनय, वज्र और वैदेही...एक लम्बी आह भर कर उसने अगला पन्ना पलटा... विनय ने उन सुनहरे लम्हों को कैमेरे में कैद कर लिया था... मानों स्मृतियों के फलक पर उभरा सूर्य-किरणों के गर्भ में पलता इंद्रधनुष! अगले पृष्ठ पर मोतियों से सुन्दर अक्षरों में लिखी एकांकीका..
पूरी डायरी विनय के साहित्यिक सफ़र का सफरनामा थी..कहीं शायरी, कहीं गीत... और उन्हें स्टेज पर प्रस्तुति देता विनय... सभी मित्रों के लिए यादों के झरोकों से झाँक कर अतीत की सैर करने का खूबसूरत मौका!
उसने दूसरी डायरी उठाई.. क्या होगा इसमें? मन ही मन कई विचार लहरों की तरह दौड़े चले आ रहें थे..
किनारे को चुम फिर अनन्त सागर में लौट कर खुद को सागर की गहराइयों में छुपा रहें थे...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र
अगला भाग अगले अंक में..

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