शिव  सावन की बौछारें

शीर्षक-शिव 

हरिगीतिका छंद आधारित गीत-

ऊपर उठे जो राग से, करते सदा जग का भला।
हैं शिव वही संसार में, सब दूर करते हैं बला।।

है सर्पमाला कंठ में, मस्तक विराजे चंद्रमा।
मृगछाल पर बैठे सदा, नित पास रहती हैं रमा।।
कलकल बहे गंगा सदा, मन मोहती है हर कला।
हैं शिव वही संसार में, सब दूर करते हैं बला।।

शंकर कहो या शिव कहो, कल्याण जग का वे करे।
इस सृष्टि के पालक वही, संताप सबका वे हरे।।
जो नाम जपता शिव सदा, फिर कौन उसको है छला।
हैं शिव वही संसार में, सब दूर करते हैं बला।।

काशी धरा है पावनी, होती सदा जयकार है।
जलधार सावन में चढ़ा, माना तुम्हें आधार है।।
'हिम्मत' झुकाए शीश ये, कुंठा सभी मेरी जला।
हैं शिव वही संसार में, सब दूर करते हैं बला।


हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा
कोलकाता
स्वरचित मौलिक

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