रघु!
शीर्षक : आशियाना!

रघु का घर! घर कहाँ बचा था? सिर्फ मलबा ही तो था! घर तो कब के दफ़न हो चूके थे भूख्खलन की विभिषिका में!
राणे परिवार का सिर्फ एक सदस्य बचा था! दस साल का बच्चा, रघु जो अपनी नानी के यहाँ गया हुआ था इतवार की छुट्टी मनाने, अपने ममेरे भाई-बहनों के साथ मौज-मस्ती करने के लिए !
हादसा हो कर दो दिन बीत चुके थे और सरकारी खाता वही में उसका नाम भी अनाथ बच्चों की फेहरिश्त में जुड़ चूका था! कल तक माँ-बाबूजी के आगे-पीछे दौड़ने वाले रिश्तेदार अब कन्नी काट रहे थे! मामा-मामी को तो मानों सांप सूंघ गया था! वो तो पुरानी स्कूल की खंडहरनुमा शेड में लगे अस्थायी शिबिर में रुके अनाथ बच्चों के बिच उसे छोड़ कर बिना बताएं ही वहाँ से चल दिए थे!
रघु उदास यहाँ-वहाँ देख रहा था! उसके जैसे और भी बच्चें थे! किसी के पिताजी दुनिया को अलविदा कह चुके थे तो किसी के भाई-बहन, किसी की माँ तो किसी के दादा-दादी!

बच्चें तो बच्चें होते है, मासूम, कोमल, निर्मल! न स्वार्थ न राग द्वेष! दो दिन के साथ ने एक-दूसरे को सम्बल दे दिया था!

इन्सान का दिल भी कितना अजीब है न! अपने जैसा दुःखियारा कोई और भी है यह देख कर भी उसे हिम्मत आ जाती है, दुःख सहने की! अब कुछ बच्चें बैठे-बैठे खाने की पुड़िया के साथ मिले कागज़ की नाव बनाने लगे और बाहर जमा पानी में  उसे उतार कर खेलने लगे! कुछ बच्चें पास चहचहाती, पाँखों से पानी झटकती गौरय्या को देख उसके साथ दौड़ने लगे! बेचारे कहाँ जानते है 'बड़ों की समझदारी'!
कोई इन्हीं बच्चों को अपने बच्चें समझ कर उन्हें ना भीगने की हिदायत देने लगे तो कोई माँ अपने फटे पल्लू से भीगे बच्चें के बालों को पोछने लगी! कोई पिता इन बच्चों के संग इधर-उधर गिरे चाय-पानी के पेपर ग्लास को उठा कर इकठ्ठा करने लगा!
मृतकों के घरवालों का स्कूल की कक्षा का यह अस्थायी आशियाना अब जिंदगी को पटरी पर लाने में, हालातों से अपना तालमेल बैठाने में लग चूका था हादसे की डरावनी स्मृतियों कों, घाँवों को भूला कर! मानवता कहीं दम तोड़ रही थी तो कहीं अपने जिन्दा होने का एहसास दिला रही थी! मृतकों के घर खंडहर में तब्दील हो चूके थे और यह नया खंडहरनुमा  'आशियाना' जिन्दा लाशों में जान फूँकने में कामयाब हो रहा था!

स्वरचित तथा मौलिक!
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा!
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