भाग ५०
अंधियारी रात में नन्हें दीप के उजाले सा वैदेही के छोटे से प्रयास ने सब के मन को आलोकित कर दिया था। मुरझाये मन में जरासी नमीं से उम्मीदों के अनगिनत कुसुम खिल गएँ थे! युवा ब्रिगेड की जीवट और जिजीविषा को ठण्डी-ठण्डी फुहारों से सराबोर कर दिया था! शुष्क अधरों पर गुलाबी छटा बिखेर दी थी!
जानकी जी ने तो मानों कई सालों के बाद अपने मन के दरवाज़े खोलकर रोशनी की सुनहरी किरणों का खुले मन से स्वागत किया था। श्री के जाने के बाद वह शायद मुस्कुराना ही भूल चुकी थी। वैदेही को देख कर ही उनके जीवन-गाड़ी के पहिएँ गतिमान होते नज़र आते और अपने जिन्दा होने का प्रमाण प्रस्तुत करते लेकिन आज वह दिल की गहराईयों से आनंदित थी। वैदेही की इस अद्भुत सफलता ने उन्हें श्री के सह-अस्तित्व का एहसास कराया था। यह वैदेही के जीवन की दूसरी शानदार-जानदार पारी की शुरुआत थी! ऐसे लग रहा था मानों उनके कुम्हालाये मन के पौधे पर किसी ने पानी की अनगिनत बुँदे छिड़क दी हो!
रात की फ्लाइट से जानकी जी और वैदेही के साथ उनकी मित्र-मण्डली भी दिल्ली पहुँचने वाली थी। आबा ने एयरपोर्ट जाने के लिए 'फॉर्रचूनर' की व्यवस्था कर दी थी। रात साढ़े बारह बजे की फ्लाइट थी। सभी वज्र के यहाँ इकट्ठा हो कर एयरपोर्ट जाने का प्लान बना चुके थे। तय समय पर सभी वज्र के यहाँ पहुँच गएँ और आबा का आशीर्वाद लेकर निकल पड़े गतंव्य की ऒर....
एयरपोर्ट पर सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए, सामान को जमा करा कर, सभी औपचारिकताएँ पूरी कर वो फ्लाइट के लिए विज्ञप्ति का इंतज़ार करने लगे और थोड़े ही समय बाद प्लाइट में बैठने के लिए एयरपोर्ट की बस में बैठ कर आगे बढ़े। मुम्बई से दिल्ली की फ्लाइट सही समय पर रवाना हुई। सभी युवाओं की हवाई मार्ग से साथ-साथ की हुई यह पहली यात्रा थी। सभी बहुत ही उत्साहित थे मानों खिला खिला चैत्री गुलाब!! गज़ब का जोश था उन में। जानकी जी को खिड़की की सीट मिली थी। वह बाहर कुछ देखने की कोशिश कर रही थी लेकिन धुप्प अँधेरे में सिर्फ कुछ टिमटिमातें तारें ही नज़र आ रहे थे! वो आँखें बन्द कर खयालों की दुनिया में खो गई! वैदेही ने जब जगाया तभी वह उठी। उनका विमान सही समय पर दिल्ली एयरपोर्ट पहुँच चूका था! आधी-अधूरी नींद जो अब तक आस-पास भटक रही थी वह भी अब छूँ-मंतर हो चुकी थी और सभी अपना-अपना सामान समेट कर एयरपोर्ट से बाहर निकल चुके थे।
जानकी जी, वज्र और वैदेही की व्यवस्था कार्यक्रम स्थल, एनआईई गेस्ट हाउस, एनसीईआरटी परिसर, नई दिल्ली में की गई थी और यश और विभा की गेस्ट हाउस के ही दूसरे विभाग में! यह विभाग राजनितिक क्षेत्र के अतिथियों के लिए आरक्षित था! अप्पा यशवंतराव जी की पहचान और प्रभाव की वजह से उन्हें यह कमरा मिला था!
वज्र ने विभा को अपनी जगह स्थानांतरीत किया और यश और वज्र उस कमरे में चले गएँ! सुबह ग्यारह बजे मुख्य कार्यक्रम था। हॉल दोनों गेस्ट हाउस के बीच में ही स्थित था। वज्र और यश ने सुबह आठ बजे तैयार हो कर इसी गेस्ट हाउस के स्वागत कक्ष में मिलने का निश्चित किया था। 'गुड नाईट' और 'स्वीट ड्रीम्स' कह कर सभी ने एक-दूसरे से विदा ली और चल पड़े अपने-अपने कमरे की ऒर ताकि कुछ समय आराम कर सकें!
कमरा वातानुकूलित, साफ-सुथरा और सभी सुविधाओं से लेस था! खिड़कियों को रेशमी पर्दे लगे हुएँ थे और झींगुरों की आवाजें रात की निरवता को भंग कर रही थी! पश्चिमी पद्धति का शौचालय और टब बाथ की व्यवस्था थी। कमरे में 32 इंच का टीवी लगा हुआ था और रिसेप्शन से सम्पर्क के लिए फोन की व्यवस्था थी। चौबीस घण्टे गर्म पानी की सुविधा भी थी! सभी ने कमरे का जायजा लिया, प्रसाधन कर्म निपटे और सभी आराम करने लगी।
विभा ने सुबह सात बजे का अलार्म लगा दिया था। वैदेही, जानकी जी और विभा, तीनों इतनी थक गई थी कि बिस्तर पर पड़ते ही सब की आँख लग गई। विभा तो कुछ ही पलों में खर्राटे लेने लगी जानकी जी और वैदेही अवचेतन मन से बातों में उलझ गई। यादों के विशाल गगन में शुभ्र-धवल बादल विचरण कर रहे थे और दोनों निंदियाँ रानी की मान-मनुहार कर कर थक चुकी थी! वैदेही के मन में कार्यक्रम में स्टेज पर क्या बोलना है इसी पर उथल-पुथल मची हुई थी। विषय ही इतना गंभीर था। हर एक शब्द तोल-मोल कर बोलना जरुरी था। भारत के प्रधानमंत्री जी को आमने-सामने मिलना और उनके सामने अपने विचार व्यक्त करने का मौका जितना अतुलनीय तथा दुर्लभ था उतना ही उसे गरिमामय तथा उपलब्धि में बदलना मुश्किल मगर मुमकिन कार्य था!
विचारों के आवर्तों में वैदेही गोल-गोल चक्कर काट रही थी और नींद थी कि उसे अंगूठा दिखा-दिखा कर चिढ़ा रही थी। उसने मन ही मन पिता का स्मरण किया और गायत्री मन्त्र का मन में जाप करने लगी! नींद की झपकी आने लगी और उसे लगा मानों उसके पिता उसके घूँघराले बालों में उंगलियाँ घुमा रहे है, जादुई थपकी देकर उसे लोरी सुना रहे है और उसे दुलार रहे है! निंदिया रानी भी अब अपना हाथ छोड़ कर वैदेही के मन-आँगन में अवतरित हो उसे हुलारने लगी और वैदेही नींद के आगोश में खो गई। उसका अवचेतन मन शांत हो गया था।
विभा का मन कुछ हद तक समझौता कर चूका था! उसे लग रहा था युवा-ब्रिगेड का वो अँधियारा अध्याय अब काल के गर्त में समां चूका हैं और खुशनुमा बयार का झोंका उन्हें आशा-निराशा के हिन्दोले पर हुलार रहा हैं! नीली छतरी वाला अपनी लीला दिखा रहा हैं और थके-हारे मन को लोरियाँ सुना कर सुला रहा है। सभी के दिलों में यादों के शामियाने तनें थे और तीनों अपनी-अपनी सेज पर पहुडी थी। काँटों की सेज अब गुलाब की पंखुड़ियाँ बन चुकी थी और रात की कुक्षी से नई भोर के जन्म का इंतज़ार था।
जानकी जी मन ही मन श्री को याद कर रही थी। कितना खुश होता श्री अपनी बेटी को भारत के प्रधानमंत्री जी के हाथों सम्मानपत्र स्वीकार करते हुए देख कर! जानकी जी
की आँखें नम हो गई थी.. नींद तो उनसे सालों पहले रूठ चुकी थी और बहुत मनाने के बाद भी अड़ियल, नटखट, नादान बच्चे की तरह लाख समझाने के बावजूद मान ही नहीं रही थी! प्रलोभन भी दे बच्चे को तो क्या दे?
सुबह सात बजे का अलार्म बजने के पहले ही तीनों जाग चुकी थी! जानकी जी तो स्नान वगैरा निपट कर, तैयार हो कर 'गायत्री मन्त्र' का जाप करने बैठ चुकी थी। वैदेही स्नान को जा चुकी थी और विभा अपनी बैग से नाश्ता करने के लिए जाने के हिसाब से साधारण ड्रेस निकाल रही थी। सूर्य की सहस्त्र रश्मियाँ देख कलियों ने अपने घूँघट उतार फेंके थे और अपने रूप-रंग-सुगन्ध से मतवालें भ्रमरों को आकर्षित कर रही थी।
वैदेही नहा कर बाहर आ चुकी थी और विभा नहाने चली गई। वैदेही ने माँ के चरण छुएँ और अपने पर्स में रखी पिताजी की फोटो निकाल उसे स्पर्श कर वंदन किया। अनायास ही उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने मुँह फेरकर उन्हें माँ से छुपाने की कोशिश की लेकिन वहाँ तो पहले ही ओले बरस चुके थे जिन्हें सँभालने की जिम्मेदारी भी वैदेही की ही थी!
वह माँ से लिपट गई। बारीश जम कर हाथ-पैर पटक चुकी थी जिद्दी नन्ही बच्ची सी रो-रो कर पूरा आसमान सिर पर ले चुकी थी और जब देखा कि इस नौटंकी से कुछ हासिल होनेवाला नहीं हैं तो तेज धारा में परिवर्तित हो कर मन के आँगन को बुहार चुकी थी। सूरज की सुनहरी किरणे उनके गालों को सहला रही थी मानों कोमल हाथों से माँ-बेटी के आँसू पोंछ रही हो ....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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