नारी, तू नारायणी! (प्रतियोगिता) विषय: 1. नारी सशक्तिकरण: व्यवधान या वरदान?" 2. "सपनों की उड़ान" 3. "क्या खोया, क्या पाया?"
हम देख रहे हैं कि इन पिछले साठ सालों में रहन-सहन, सामाजिक परिवेश, कौशल-कला, संगीत-साहित्य, परिपाटी-प्रथाओं में भारी बदलाव आया है। कितनी प्रथा-कुप्रथाएं विलुप्त हुई और कितनी प्रथाएं, कुप्रथाएं प्रचलित भी हो रही हैं। 

इन बदलावों में एक विषय नारी सशक्तिकरण के बारे में बात करूं तो, उसमें काफी प्रगति हुई है। पर आज भी हमारे ग्रामीण भारत के कई समाजों में महिलाओं को जो स्थान प्राप्त होना चाहिए, वो स्थान प्राप्त नहीं है। 

   हो सकता है कि पहले की अपेक्षा इस मसले पर सुधार आया होगा, पर अभी भी हालात जस के तस हैं। आज भी कई इलाकों में, कई समाजों में नारियों की अस्मत सुरक्षित नहीं है, अभी भी शिक्षा क्षेत्र में नारियां पिछड़ी हुई हैं और जो शिक्षित हैं, उनको भी अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता है। आज भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। एक बात कहूंगा कि इसका कारण न केवल नर या नारी है, बल्कि सरकारी नियम  कायदे इतने दमदार नहीं हैं, या कहें कि कायदों  के परिपालन में ढूल मूल रवैया भी चल रहा है ।



नारी सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को समाज में समान अधिकार और अवसर प्रदान करना, जिससे वे अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से जी सकें और अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। नारी सशक्तिकरण के लिए हमें समाज में बदलाव लाना होगा, जिसमें महिलाओं को समान अधिकार और अवसर प्रदान किए जाएं। हमें महिलाओं को प्रोत्साहित करना होगा और उन्हें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए समर्थन देना होगा।

मैं इस बात की हमेशा पैरवी करता आया हूँ कि महिलाएं पग भर हों, और गृहस्थी चलाने में महिलाएं आर्थिक सहयोग करें, अपनी कौशल-कला का सद्पयोग कर आर्थिक प्रगति में अपना योगदान दें। महिलाओं को शिक्षा मिले, ताकि वे अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकें, अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकें, महिलाओं को समान अधिकार देने का भी मैं समर्थन करता हूँ, मैं  तो चाहता हूॅं कि महिलाएं देश के उच्च पदों पर आएं और आकर देश का सुचारू संचालन करने में अपनी क्षमता-सक्षमता बढ़ाएं। अपने स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक बनें और अन्यों को भी जागरूक करें।

नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का यह अर्थ भी न लें कि नारियां स्वच्छंद बन कर घूमें, और पुरुषों का मान भंग कर आगे बढ़ने की कोशिश करें, अपनी मर्यादाओं को ध्यान में रखकर जीवन में मधुरता का रस घोलें। भारतीय संस्कृति की गरिमा को भी खंडित न करें। दरअसल, नारी सशक्तिकरण के नाम पर एक बड़ा वर्ग ऐसा पनप रहा है, जो महिलाओं की गरिमा को नष्ट भी कर रहा है, 

एक बात और ध्यान में लेने जैसी हैं कि कितनी बार महिलाएं बड़ी गलतियां करती है, बहुत बार पहनावे परिवेश और अपने दर्जे दायरे को भूलकर तकलीफ़ मोल लेती है ,आ बैल मुझे मार वाली बात सामने आने के किस्सों में भी वृद्धि हुई है । 

पुरूषों को भी चाहिए कि महिलाओं का मान सम्मान करें, उन्हें अवसर दें अपनी प्रतिभा को निखारने का ।

आलेख :अशोक दोशी 'दिवाकर' 



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