दो साल हो चले थे रेहान को इस कंपनी में नौकरी करते हुए, लेकिन अंदर से कुछ कमी - सी महसूस हो रही थी। ऐसा नहीं कि उसने किसी के बहकावे में आकर यह रास्ता अपनाया था किन्तु यहाँ काम करते- करते उसे धीरे- धीरे यह प्रतीत होने लगा की मेरा जन्म किसी और कार्य करने के लिए हुआ है ना सिर्फ नौकरी कर अपने परिवार का पोसना ही मेरा मकसद है।
रेहान काफी सोच- विचार में डूबा रहता कि कैसे मेरे शिक्षा के खातिर पिताजी ने अपनी खुशियों का त्याग किया, आज भी याद है मुझे अगर मैं कभी परेशान या बीमार हो जाता तो रात - रातभर जागकर माँ मेरे बिछाने के पास बैठकर मेरी सेवा करती, वह चाहे कितनी भी वेदना से ग्रसित क्यों न हो किन्तु मेरा ध्यान बराबर रखती, स्वयं के दु: ख को अपने अंदर समेटे मैंने कितनी ही बार उन दोनों को मुस्कुराते हुए देखा है। मेरी परवरिश के खातिर बहुत सी तकलीफों को स्वीकार किया। ताकि उनको यकीन था कि एक न एक दिन वह एक सफल अभियंता जरूर होगा। चार सालों की शिक्षा मैंने छह सालों में पूरी की जिस कारण परिवार की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई और कर्ज के दबाव से पिता का शरीर उम्र से पहले ही क्षीण होता देख रहा था।
आज अगर मैंने अपनी बात उनके सामने कहीं तो वह अंदर से और टूट जाएंगे, किन्तु ये चंचल मन मुझे बार - बार इससे बाहर निकालने का प्रयास कर रहा है। उन्हें किस तरह समझाया जाये जिस कारण वह ना टूटे। लंबे समय तक इंतजार करने के बाद मैंने अपने अंदर की आवाज सुनी और मैंने अपना फैसला पिताजी के समक्ष रखा तो पहले वह शंकित हुए और नाराज भी।
उनकी ये नाराजगी स्वाभाविक ही थी क्योंकि जिस क्षेत्र की ओर आगे मैंने बढ़ने का निश्चय कर लिया था, उसके लिए धैर्य और अनुशासन होना चाहिए। इतना धैर्य वह अब नहीं रख सकते थे, उनमें इतना साहस ही नहीं रहा कि वह अन्य कोई आपदा स्वीकार कर सके। कोई पिता कैसे अपने बच्चों को मुसीबत में डालना चाहेगा। पहले मना करने के बावजूद मेरी खुशी के खातिर उन्होंने उद्योग निर्माण की आज्ञा दे दी।
मैंने अपने साथी के साथ मिलकर उद्योग निर्माण की नींव रख दी, देखते - देखते तीन - चार महीनों बाद ही हमारा उद्योग पटरी पर आने लगा। नियति को हमारी खुशी देखनी ही न थी कि सरकार के संपूर्ण लाॅकडाऊन के फैसले से हमारी बंधती हुई उम्मीद धीरे- धीरे टूटने लगी। सारे समाज में भयंकर तांडव मचा हुआ था इस भयंकर बिमारी का जिसके कारण नये पंख आसमान में उड़ान भरने के प्रयास से पहले टूट गए। कईयों ने अपना दम तोड़ दिया, सारी की सारी ख्वाहिशें और उम्मीदें टूटकर बिखर गयी।
परिवार को मुझसे जो उम्मीदें बंधीं हुई थी वह पूरी तरह मिट गई, अगर नौकरी में बना रहता तो आज जो मुसीबत आयी वो कभी नहीं आती और आज सुकून से जिंदगी काट रहा होता। परन्तु होनी को कौन टाल सकता था, बस ये आशा अभी तक जिन्दा रखी थी एक न एक दिन ये सब बिमारी मिट जाएगी और सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा। वक्त के साथ- साथ यह आस भी शम गई।
मेरे साथी ने भी मेरा साथ छोड़ दिया और उसने अपने रिश्तेदार के कहने से कहीं नौकरी स्वीकार कर ली। मुझमें इतना साहस कैसे आ गया कि मैं खुद पर इतना विश्वास कर सका।
सचमुच डरा - डरा सा रेहान अब काफी बदल गया था, मुसीबतों से दूर भागनेवाला खुद मुसीबतों को अपने सिर पर ढोने लगा, जैसे दुनिया की सारी तकलीफें, मुसीबतें, दु: ख - दर्द अब उसे ही सहने है। एक बार सोचा कि बंद कर देते है कार्य और पकड़ लेते है अपना वह पुराना काम, लेकिन दिल और मन ने साथ नहीं दिया । समाज, बिरादरी तथा कहीं ऐसे रिश्तों के बार - बार सचेत कर देने के बावजूद तथा उनके ताने सुनने के पश्चात भी वह अपने निर्णय पर अड़िग रहा, डटा रहा। ये उसके गजब के आत्मविश्वास की जीत थी कि उसने धीरज न खोया।
सड़क पर गुजरते हुए लोगों की निगाहें जो आज से पूर्व गर्व से उसकी तरफ देखती, जो ऑंखें गुरु एवं प्रेरणा के स्तर पर उसे देखती वही निगाहें उसे आज घृणा के भाव से देख रही थी। जिस समय सबसे ज्यादा अपनों की जरूरत रेहान को थी उसी क्षण सारे समाज ने उससे मुंह मोड़ लिया। उससे बातें करने से परहेज करने लगे सब गाँव वालें। रेहान अपने आप को अकेला महसूस करने लगा। अपने पिता की जो साख बनी हुई थी वह भी मिट गई। लोगों का कहना था कि जो स्वयं अपने आप पर कुल्हाड़ी मार लेता हो ऐसे लोगों की कौन मदद करें? इन्हें जो मदद करेगा उसका भी यही हश्र होगा, ये बात गाँववालों के मन में बैठ गयी। उन्हें मदद करने से सारे लोग दूरी बनाए रखते, उनके खर्च भी बढ़ गए और आमदनी शून्य हो जाने के पश्चात कोई कैसे मदद दे। जो धनवान लोग थे, उनके लालची वृत्ति में और बढ़ोतरी होने लगी। उनको हमेशा भय सताता की इस नये छोकरे ने तो अपने परिवार के बारे में न सोचा और आईंदा कोई नयी मुसीबत आ जाये तो अपने हाथ ऊपर उठाकर भाग खड़ा हो जाएगा। इस समस्या के चलते- चलते रेहान का परिवार अपने को अकेला महसूस करने लगा। उनके रहन - सहन में भी काफी बदलाव आने लगा। रेहान इस सारी समस्या की जड़ खुद को समझने लगा। लोगों के लगातार तानों से अब भय लगने लगा, वह अब बाहर जाने की सोचने लगा ताकि शान्ति मिल सके लेकिन अपने परिजनों को वह और पीड़ा नहीं देना चाहता था। वह चुपचाप सारे दोष स्वीकार करता हुआ जीवन जीने लगा।
अपने मित्र की मदद से यह परेशानी हल तो गयी कि दो जून की रोटी प्राप्त हो जाये, लेकिन उसके समक्ष एक चिन्ता अभी वैसी खड़ी थी जिससे निकलने का प्रयास वह कर न पा रहा था।
सरकार के इस फैसले से उसे राहत मिली की अब से सब कार्य धीरे- धीरे से शुरू कर सकते है। इस बार उसके हितचिंतकों ने सलाह दी कि वह कोई नौकरी ढूँढ ले, लेकिन वह नहीं माना और अपने दम पर उसने उद्योग करने की ठान ली।
कुछ सालों बाद रेहान के द्वार पर कई सारे लोगों का जमावड़ा दिखने लगा, ये लोग वही थे जिन्होंने कभी रेहान और उसके परिजनों को अपने आसपास भी भटकने न दिया। आजकल रेहान सारे गाँववालों को दोनों हाथों से मदद कर आशीर्वाद कमाने का कार्य करता है।
मंथन विनायक देवरे " हिम "