दो पैरों वाला प्राणी

दो पैरों वाला ये प्राणी

है जन्मों जन्मों का शातिर |

इसने रब का खेल बनाया

छल के मंसूबों की खातिर ||

 

रब जो यत्र तत्र मिलता था

भोले चेहरों पर खिलता था |

मीठी वाणी सुथरे मन में

अविरल गंगा सा बहता था ||

 

उसको मंदिर में खिसकाके

जाने इसने कहाँ छुपाया |

वहां बिठा के रब की प्रतिमा

मंदिर में ताला जड़वाया ||

 

ऐसी व्याख्या कर दी रब की

सबकी बुद्धि हो गई फेल |

रब को कैसे पाएं इस पर

खूब मचा दी रेलमपेल ||

 

इतने रख दिए रब के नाम

गुम हो गई उसकी पहचान |

रब के नाम की लूट मचा के

कर दिया उसका काम तमाम ||

 

ठेकेदारों से जब पूछा

क्या है रब का पता ठिकाना |

कहाँ पे रहता कहाँ पे बसता

कहाँ है उसका आना जाना ||

 

कोई बोला ढूंढो वन में

या पर्वत पे या उपवन में |

तभी कोई धीरे से बोला

वो तो बसता तेरे मन में ||

 

मैं  बोला जो रहता मन में

वो तो वैसे ही मेरा है |

क्योंकि रहने को मैनें ही

उसको दिया बसेरा है ||

 

में पूछूँ की कौन हैं ये जो

चोगे पीले श्वेत पहनकर |

बैठ गए हैं मुखिया बनके

गली मोहल्ले शहर शहर ||

 

यहीं कहीं पर तेरे मन में

सत स्थापित है भगवान् |

वहीँ  किसी कोने में बैठा

पतित तमोगुण इक शैतान ||

 

सो तुम इधर उधर न दौड़ो

खुद को मन मंदिर से जोड़ो |

मन में झांको शीश नवाओ

 

भगवत सत्ता से जुड़ जाओ || 

भगवत सत्ता से जुड़ जाओ ||

                                                                                    

चंद्र मोहन कत्याल

ग्रेटर नॉएडा उत्तर प्रदेश-201310 भारत 

 


द्वारा chandra katyal
Shared07 Jul 2026
Start 07 Jul 2026
End 07 Jul 2027
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