प्रतियोगिता: रक्षाबंधन! शीर्षक : आओगे न भैया....

आओगे न भैया....हाथों में हाथ लिए चुने थे जहाँ परिजात, उसी आँगन में फले-फूले हमारे सपने, जज़्बात! माँ-बाबूजी के आशीर्वाद की फुहारों से भीगा था जो आँगन, उसी की मिट्टी की खुशबु में पले बढ़े हम सब! 
वो छुपा-छुपी, लंगड़ी, गुड्डा-गुड्डी की शादी की बारात और वो भुनी हुई मूंगफली के बिच गुड़ भर कर बनाये शादी के लड्डू की सौगात, क्या भूल पाएं हम आज तक उसकी मिठास? खुले आसमान तले घंटों खड़े रहकर पतंगें उड़ाना, वो माँझे को लपेटना, नील गगन में लहराती पतंग को देख कर तालियाँ बजाना क्या मिल पाई है ऐसी अनुपम खुशी आज तक? दादाजी के हाथों लगाए आम्रवृक्ष के पत्ते इकट्ठा कर वन्दनवार बनाना, दशहरा-दिवाली को आँगन के कोने में किला बनाना और उसके ऊपर तोफे, सुरक्षाकार्मियों को तैनात करना, कहीं पहाड़ी पर 'चेतक' हेलीकाप्टर, कहीं वायुसेना के डमी लड़ाकू विमान हवाईपट्टी पर सज्ज रखना और तिरंगा शिखर पर लगा कर सलामी देना याद है न भैया? आँगन में गिरे कच्चे आम धो-धो कर, कांट-बाँट खाना, कहाँ मिलेगा ऐसा मजा? 

हैं कोई ऐसे रेस्टोरेंट जहाँ मिलती हैं ऐसी खुशियाँ? वो फूलों की क्यारियों में तितलियाँ उड़ाना, एक-दूजे की चुगली करना और कभी बाबूजी की डांट-मार से बचाना... क्या कहूँ! है कहीं ऐसा अद्भुत प्यार, रिश्तों का बेमिसाल तालमेल, कच्चे धागों का रेशमी, नाजुक बंधन, रक्षा-सूत्र अनूठा, अनमोल प्यार की कोमल डोर का बन्धन?

कृष्णा-कोयना नदियों का वह संगम, मानों आपसी विश्वास का अतुलनीय सागर...
सदभाव, समर्पण, सौहार्द का आगार...
संवेदनाओं की रेशम-लड़ियों का संसार!
प्यार-दुलार का यह उफनती लहरों का समंदर क्या कायम है अब भी?

भाई-बहन का अदभुत उत्सव रक्षाबंधन!
द्रोपदी-श्रीहरि के रक्षा-सूत्र का विराट दर्शन, जिसमें दृष्टीगोचर होता है वह नाजुक कोमल रेशमी बन्धन! इतिहास के पन्नों पर सुवर्ण अक्षरों से अंकित कर्णावती की राखी का पर्व...रख़डी पूनम! माँ भारती की चरण पूजा करते-करते कहीं भूल तों नहीं गए न भैया अपनी अगम्य शक्ति को परिलक्षित करता यह मजबूत बँध? 
विपदा में मजबूत ढाल बन कर खड़े हो आप देश की लाखों बहनों के लिए, गर्व हैं मुझे आप पर!

इस रक्षाबंधन पर जरूर आओगे न भैया? इस निस्वार्थ, अटूट अनुबंध, रक्षासूत्र, कवच-कुंडल,  की लाज रखोगे न भैया?
भैया ! जबाब दो न भैया...अरे! यह.... यह क्या हो रहा है? यह गोलियों की आवाज़? हैलो..हैलो....

भैया... भैया! खामोश क्यों हो...बोलो न भैया.... कहीं दुश्मन ने.... भैया....आओगे न भैया.... बोलते क्यों नहीं?
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई महाराष्ट्र!

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  • क्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️