आवरण:
सहस्त्र रश्मियों ने खोले, कलियों के घूंघट,
महकी फिज़ा, डोला तन-मन!
बहकी हवाओं ने उंडेले, बादलों के अमृत घट,
भीगी धरा, महका उपवन!
पंखुड़ियों ने उतार फेंके, लज्जा के आवरण
तोड़ी परंपराएं, झूठे बंधन!
कांटों पे मुस्कुराएं गुलाब, भूल दर्द का जमघट,
बिखरा इत्र, खुला अंतर पट!
नवयौवना सी दुल्हन, ओढ़ चुनर, चली पनघट,
उम्मीदों की डोलची से भरे घट!
लाज-शर्म छोड़-छाड़, चली प्रिय पथ, ले अमिघट!
न जग की चिंता, न भय का सावट!
कृष्ण की मीरा, कान्हा की राधा, खोल ह्रदय पट,
तोड़ मोह-माया बंध, समाई अनंत!
आत्मा से परमात्मा मिलन, करे भव फेरे संपुष्ट,
जैसे सागर में नदी, क्षीर में मिष्टी!
न हो रावण से दस आनन,
न मुखौटों का आवरण,
न मन में द्वेष-कपट,
न हिंसा-चोरी का भाव!
कवच कुंडल गुरुवचन,
गुरु बिन जन्म माटी मोल!
आलोकित हो जीवन,
होय मनुज जन्म सफल!
भव-भव के आवरण,
गुरु करे आतम जागरण,
बेते दर्जी सम थान,
सदगुरु! आत्म ज्ञानी जाण!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र।