आस्था / उल्लास/ अज्ञानता
नमन मंच
शब्द कुसुम 
विषय- उल्लास /आस्था 
दिनांक- 24/9/25
यह कथा बिल्कुल काल्पनिक है यह मेरा स्वयं का व मौलिक चिंतन है ।

शेरमल जैन का बेटा कामेश‌ में आस्था तो न के बराबर थी, पर गणेश हो या नवरात्रि ,बस मटर गश्ती करना, गरबों  में जाना , छेड़खानी करना दशहरे पर मित्र मंडली के साथ रावण दहन में हिस्सा लेना, पता नहीं कामेश को इसमें कौनसा आनंद  मिल रहा था, उत्साह व उमंग में रहने वाले कामेश में न सोच थी न चिंतन न चिंता । एक बार शेर मल जी जैन कामेश को संतवाणी का श्रवण करने ले गये । पता नहीं कामेश का कैसा पुण्योदय था कि उस मन लगा कर सुन रहा था , योग ऐसा कि संत वाणी में रावण दहन कितना तार्किक यह विषय था। मुनिवर ने समझाया कि रावण दहन से क्या फायदा ,इससे तो आपके द्वारा की गयी हिंसा  का दोष लगेगा।रावण अंहकारी था इसलिए उसका पतन हुआ, उस समय की ऐसी स्थिति बनी थी तो , राम को उसे मारना पड़ा, उस समय उसे न मारते तो  वो राक्षस गुणी अहंकारी रावण और कुछ असंगत आचरण भी करता, उस समय राम का क्षत्रिय ‌धर्म निभाना जरुरी था।

पर  अब तो उस बात को युग बीत गये , पता नहीं रावण  की आत्मा अभी तक मुक्ति को प्राप्त 
हो चुकी होगी, संतों ने यह भी समझाया कि आज हम  रावण को जलाने की प्रक्रिया करते हैं वह क्रिया क्रोध,से प्रेरित है , घृणा से प्रेरित है , द्वेष से प्रेरित है और वे सभी पाप कहलाते हैं ये पाप हमारी आत्मा का पतन‌ करते है। 

इससे तो अच्छा मर्यादित राम को स्मरण करो कि वे कितने मर्यादित थे,और प्रेरणा लें।
रावण के वध‌ के बाद मर्यादित पुरुषोत्तम राम ने घोर तपस्या की थी । 
युद्ध की हिंसा से उत्पन्न हुई अशांति का प्रायश्चित किया था । प्रकांड विद्वान रावण का मारने के बाद,ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए राम ने जप किये थे ।

उन ज्ञानी संत की बात कामेश ने समझी जानी,
कामेश को आज देखें तो वो पहले वाला कामेश नहीं रहा, काफी परिवर्तन आ गया ।अब  कामेश की आस्था शाश्वत तार्किक व अनुशासित ,धर्म में बढ़ गयी।

लघुकथा :अशोक दोशी
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