स्वयंसिध्दा


स्वयंसिध्दा

ढल गयी उम्र, कुम्हलाये हम,
कदम भी डगमगाने लगे अब।।

सबके लिए हंसते- मुस्कुराते,
जीते रहे जमाने के लिए।।

चलते चलते दूर तक आये
थका तन-मन, पांव थके।।

मिली फुरसत, थामी कलम,
शब्दों की माला गुंथने लगे।।

थोडासा हौसला पांखों में भर,
नील गगन को छूने चले।।

सहेजे फूल कांटों से चुन-चुन,
पसंदीदा पथपर बिछाते चले।।

आस नवल जगी हैं मन में अब,
सच होंगे अपने सुनहरे सपने।।

अनछुए जीवन के पहलू कितने ही,
खुलकर अब रंग भरेंगे जी जान से।।

जियेंगे अपने लिए, ढूंढेंगे खुशी,
संध्या मौसम सुहाना सजायेंगे।।

यौवन का आह्लाद, उल्लास,
सुबह की तरो-ताजगी सहेजेंगे।।

अब जो ढूंढ लिया है स्वयं को,
स्वयंसिध्दा बन खिलते रहेंगे।।

सजधज संवरकर जब निकलेंगे,
उलांचे भरेगा मन अलबेला, चंचल।।

स्वरचित  मौलिक  रचना
चंचल जैन
मुंबई,  महाराष्ट्र
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