मयूर जैसे बारीश की फुहारों का इंतज़ार करता है वैसे ही वह फ़ोन का इंतज़ार कर रही थी। फ़ोन की रिंग बजी और गीत की धुन बजने लगी, "आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जगह....उसने फ़ोन उठाया। चॉकलेट की मिठास अभी जीभ पर थी और उसका फ़ोन देख वह बहुत खुश हुई... उसने शरमाते हुए फ़ोन उठाया.. सामने से आवाज़ आई.. विल यू मीट मी नॉऊ..अट कार्नर? न जाने क्या जादू किया था उसकी मद भरी मुस्कान ने... वह दौड़ी चली गई कार्नर की तरफ...वह खड़ा था हाथ में टेड़ी लिए! सुन्दर, सलोना, सफेद, लाल आँखोंवाला टेड़ी! प्यारा प्यारा! उसने आगे आकार प्यार से टेड़ी थमाया और कहा," थिस इस फॉर यू! मै लव!" वह निशब्द उसे देखती रही.. गेहूआ वर्ण, छोटी-छोटी मूछें, नीली बढ़ी-बड़ी आँखें मानों बड़ा सा दर्पण और चेहरे पर खिले गुलाब से मुस्कान! उस पर उसका पसंदीदा परफ्यूम! वह मानों मोहीत हो गई थी उस पर! उसने धीरे से थैंक यू कहा और चल पड़े दोनों सामने के उपवन की ऒर..
राह में जरासी ठोकर क्या लगी उसने झट से हाथ आगे बढ़ाया और बाहों का सहारा दिया। वह संभल गई और थोड़ी सी उससे दूर हट गई! न कोई वादा न प्रोमिस!
कैसे भरोसा करूँ? मन ही मन वह सोचने लगी! दोस्ती में हर्ज क्या है? अभी तो परखने आजमाने में वक़्त है! क्यों करूँ जल्दबाजी? विश्वास के बगैर आत्मसमर्पण?
वह बोल पड़ी, " कल मिलते है! वहीं कार्नर पर!"
वह समझ गया! उसने भी खुद को संभाला और सोचा, क्यों न वक़्त दिया जाय रिश्ते को फलने फूलने को! आखिर फूल तो ऋतु आएगी तभी खिलेगे! और दोनों अब एक हुजे का हाथ हाथ में ले चलने लगे नई सुबह का इंतज़ार करने की मंशा से... प्यार की निशानी टेड़ी को सीने से लगा कर वह छल रही थी घर की ऒर उसके फ्लाइंग किस को स्वीकार कर... ख़्वाबों की आकाशगंगा को सजाने...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोज सुराणा , मुम्बई।