विषय:साधु-संतों की सुरक्षा पर मुझ अकिंचन का चिंतन
साधु-संतों की आए दिन सड़क हादसों में मृत्यु और हम अनुयायियों द्वारा "जय जय नंदा! जय जय भद्दा!" कहकर इति श्री कर लेना क्या यह उचित है?
"ॐ शांति, ॐ शांति" लिख देना समस्या का हल नहीं है।
ये घटनाएँ मन को अशांत करती हैं। हम जैसे सामान्य, अबोध जनों के मन में नफरत भी पैदा करती हैं। हम धर्म से विचलित होकर क्रोध और कटाक्ष करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही कर्मों का बंध कर लेते हैं।
क्या यह विचारणीय नहीं कि दिल दहला देने वाली, दर्दनाक दुर्घटनाओं को कैसे रोका जाए?
हम कितनी भी कोशिश कर लें, यह सिलसिला बंद नहीं होने वाला, जब तक ठोस समाधान न खोजा जाए।
इसके कारणों कि यह में जाएं तो पहला कारण विहार की शुरुआत भोर के अंधेरे में करनी पड़ती है , चुंकि ठंडे प्रहर में गंतव्य तक पहुंचने के लिए यह क्रिया जरूरी हो जाती है , वाहनों की बढ़ती संख्या, पगडंडियों का अभाव और कच्चे रास्तों की दुर्दशा के कारण सड़कों पर विहार करना मजबूरी बन जाता है।
मैं मानता हूँ कि साधु-संतों का जीवन सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह से युक्त होता है। मुक्ति-मार्ग की खोज में तप, जप, ध्यान में रहना पूज्य मुनियों का उत्कृष्ट ध्येय है। वे नहीं चाहते कि उनके द्वारा सूक्ष्म से सूक्ष्म हिंसा भी हो।
यह उनका कितना सुंदर अनुमोदनीय भाव और उत्कृष्ट मार्ग है!
परंतु फिर भी मेरे मन में यह प्रश्न बार-बार घूमता है कि आज के युग में युवा मुनियों का पैदल विहार तो ठीक, पर बाल मुनियों और वृद्ध मुनियों का राजमार्गों पर लंबा विहार करना और अवांछित हादसों का शिकार होना, क्या यह उचित है? कितनी बार ऐसी स्थिति हो जाती है कि जीवन भर के लिए हादसे के शिकार संत परवश हो जाते हैं और संयम की पालनी और धर्म करनी से बाधित हो जाते हैं ।
वे सहर्ष कष्ट झेलते हैं, यह अत्यंत अनुमोदनीय है। परंतु जब हादसों से निकलती आह और कराह के बाद ट्रक चालकों पर शक, फिर विद्रोह, झंडे-रैली निकालकर मन में क्रोध व नफरत भरना और अन्यों को नफरत के लिए उत्साहित करना क्या महावीर की वाणी इसका आदेश देती है?
बदलते युग में संतों की चर्या में बदलाव तो आए ही हैं। उन चर्याओं पर अवश्य मनन हो जो अतार्किक हैं, जैसे बाल-दीक्षा होनी चाहिए या नहीं। समस्या है तो शंका-समाधान भी होना चाहिए।
मैं अधिक नहीं जानता। दुर्घटनाओं से मन विचलित हुआ, इसलिए इस विषय पर मेरे मन में आए विचार रखे हैं। हो सकता है मैं जिनशासन व जिनशासन के नियमों के साथ या उस दृष्टि में गलत भी होऊँ। यदि मेरी सोच को मान्यता न मिले, तो मैं इसे सहर्ष वापस ले लूँगा।
हमारे महात्मा मोबाइल जैसे साधन परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उपयोग में ले ही रहे हैं। उसमें जीव-हिंसा होती ही है। मोबाइल-इंटरनेट तरंगों से पक्षियों की कितनी ही प्रजातियों का नाश होता है, यह हम भली-भांति जानते हैं।
वाहनों का उपयोग महाराज साहब का सामान ढोने के लिए तो होता ही है। उनके निमित्त दर्शन-वंदन के लिए लाखों-लाखों भक्त ट्रेन, हवाई जहाज, कार आदि से आवागमन करते ही हैं, तो क्यों न वे स्वयं ही वाहनों का उपयोग कर लें?
एक और बात वाहन का दुर्पयोग न हो उसके लिए गुरूभगवंतो को गंतव्य तक चुस्त धर्मानुरागी श्रावक व श्राविकाए गाड़ी चलाएं और उनके साथ रहे ,कोई दूसरा ड्राइव नहीं करें ।
वृद्ध संत व्हीलचेयर लेते हैं और साथ में उसे चलाने वाले पुरुष, साध्वियों के साथ महिला सहयोगी भी लगते हैं। खैर, उनका भुगतान तो दानवीरों को करना है और उन्हें रोजगार मिल जाता है उस पर कोई बात नहीं, यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।
परंतु साधु-चर्या में कान ऐसे पकड़ो या वैसे पकड़ो, बात तो वही है। मैं तो कहता हूँ कि यदि वे वाहन का उपयोग करें तो दर्शन और देशना दो कार्य सिद्ध होंगे। जो लोग दर्शन को नहीं आ पा रहे हैं, वे भी लाभ ले सकेंगे। और जहाँ गुरुभगवंत नहीं पहुँच पा रहे, वहाँ भी पहुँच पाएँगे।
आज अधिकतम जरूरत है अहिंसा के उपदेशों को जन-जन तक फैलाने की।
आज अधिकतम जरूरत है भाईचारा फैलाने की ।
भारत के पूर्वी और उत्तरी पूर्व क्षेत्र में भी धर्म पहुंचे
जैन धर्म क्यों सिमट रहा है, इस पर मनन-मंथन कर कुछ मार्ग निकाला जाए ताकि अधिकतम लोगों तक महावीर की वाणी का प्रसार हो।
देश, काल और समय के अनुसार परिपाटियाँ पहले भी बदली हैं। दिगंबर से श्वेतांबर बने, यह भी तो एक बदलाव ही था। कुछ जायज जरूरत महसूस हुई होगी, तभी तो बदलाव आया होगा।
यदि गुरुभगवंत के दर्शन के लिए ढेर सारे भक्तों को भाग-भागकर आना न पड़े,
इससे अच्छा दो संत वाहनों में खुद जाकर हजारों लोगों को बोध देकर आ सकते हैं। दो संतों के दर्शन के लिए हजारों लोगों का एक-दो या चार घंटों के लिए आना, क्या यह नादानी नहीं है?
हमारे संतों के उपदेशों में मुख्यतः शाकाहार का प्रचार अधिक हो। जैनेतर जातियाँ कंद-मूल खाती हैं और हमारे जैन समाज में भी कंद-मूल का उपयोग हो रहा है , इसे मैं गौण समझता हूँ।
मुख्य तो पंचेन्द्रिय हिंसा, मांसाहार, व्यभिचार, जुआ, अनाचार, आतंक, बलात्कार इन दूषणों पर अधिक से अधिक व्याख्यान होने चाहिए। उन चीजों को बंद करवाएँ जो हर किसी के लिए घातक हैं।
चलो, एक बार मैं मान लूँ कि वाहनों का उपयोग मत करो। उसमें भी यदि कुछ अड़चनें आती हों, तो मैं उस पर जोर नहीं देता। परंतु हादसे टालने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। उस पर गहन चर्चा की आवश्यकता है।*
मेरे एक मित्र ने बताया कि महावीर कहते हैं कि पन्ना समिक्खए धम्मं" प्रज्ञा से धर्म को देखो।
अशोक दोशी 'दिवाकर'