आत्म स्वावलंबी ....


दिनांक:१६-१०-२०२५

विषय: चित्रा भिव्यक्ति 

विधा :लघुकथा 


जतिन  क़रीब कोई होगा दस बारह साल का, और बहन सुरेखा पन्द्रह सोलह साल की, हुआ यह कि अचानक दोनों भाई  बहनों पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा, वो‌ इस तरह कि माॅं पिताजी दोनों की एक ट्रेन हादसे में मृत्यु हो जाती है । 

सगे संबंधी दस पन्द्रह दिन तो संबल सांत्वना दिये, फिर सभी  अपने अपने घर चले गए। 


संबल सांत्वना के बाद अब फोन पर  सलाहों का सिलसिला चालू हुआ, दुःख का पहाड़ टूटा, पर वे दोनों टूटे नहीं बल्कि, हिम्मत रखते हुए आगे बढ़े।मन ही मन दुःख झेलना और सोचा कि होनी तो होकर रहती है, यह किसी के बस में नहीं इसे टाला नहीं जा सकता।


सुरेखा उम्र में छोटी जरूर थी, पर मन से परिपक्व थी, उसने अपने बूते पर चलना था। 

वैसे जिंदगी के कठिन पड़ाव पार करना आसान नहीं था, चुंकि पिताजी इतने मालदार भी नहीं थे कि रास्ते सुगम बनते। बहन सुरेखा ने मेहनत कर भाई को किसी तरह पढ़ाया, और खुद भी पढ़ कर पारंगत हुई,मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, सुरेखा ने  माॅं और पिताजी की भूमिका निभायी और बड़े यत्न से जतिन को बड़ा किया। अब  तो रास्ते  और भी दुर्गम थे , संगे संबंधियों की सलाह के बाद तानों की बौछार। 

पर  जतिन बहन का बराबर साथ निभाता रहा, बहन‌ की योग्यता को देखते कोई अच्छा रिश्ता मिला और शादी करवा दी। जतिन भी तो बड़ा  हो गया था उसकी भी अच्छी नौकरी लग जाती है । दोनों भाई बहन का परस्पर सहारा रहा और सफल जिंदगी जी रहे हैं । जतिन और बहन सुरेखा को रिश्ते दारों ने सताया तो बहुत पर दोनों भाई बहन,कभी विचलित नहीं हुए,न पलटवार किया, अपनी छवि को साफ सुरक्षित रखा।मौन धरते हुए अपनी सफलता की मिसाल दी। किसी से नाता खराब नहीं किया।

अब संबंधियों को अहसास हुआ कि वे कितने गलत थे।



स्वरचित :अशोक दोशी





इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • लाजवाब ❤️🙏❤️🙏❤️
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।