शीर्षक: उपहार!
घर-आँगन केसर और बासमती चावल की खुशबू से महक रहा था! पिताजी ने माँ भगवती के आगे दीप जलाया और वणज का भोग लगाया!
आज नारळी-पौर्णिमा, रक्षाबंधन का त्यौहार! घर के सभी सदस्य आज छुट्टी मना रहे थे! हँसी के फव्वारे छूट रहे थे...हम सभी भाई-बहन छोटे भाई का इंतज़ार कर रहे थे! मस्ती की पाठशाला में अंताक्षरी की धूम मची थी! चुटकुले बिच-बिच में माहौल में हँसी तड़का लगा रहे थे! समय का ध्यान किसी को नहीं था
तभी माँ-पिताजी की नज़र घड़ी की ऒर गई और वो चिंता में डूब गए! "सुरेश सुबह पांच बजे निकला था मिरज से .. अभी तक क्यों नहीं आया? सभी की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ नजर आने लगी! भूख सब को लगी थी पर कोई खाना खाने को तैयार ही नहीं था..
जोश के उफ़नते दूध में मानों ठंडी पानी की बुँदे पड़ गयी थी! शनुमा बयार भी खामोश हो चुकी थी, फूल-पत्तों सरसराहट बंद हो चुकी थी और एक अजीबोगरीब सन्नाटा छा चूका था!सब की नजरें बंगले के फाटक की तरफ थी!
तभी जोर से ब्रेक मार कर एक गाड़ी घर के सामने रुकी और अंदर से भाई बाहर आया! ये क्या? माथे पे पट्टी, जगह-जगह ज़ख्म, ताजा लहुं के दाग....हमारी तो बोलती बंद हो गई थी!
सुरेश ने ख़ामोशी से बाप्पा के चरण छूँयेन और वह माँ से लिपट गया!
"माँ! आज रक्षाबंधन है न माँ? माँ भगवती और आप सबकी दुआएं मुझे मौत के मुँह से खींच कर घर ले आई!
यमराज ने भी देखा! मेरी बहनों के राखी के रेशमी धागे कितने मजबूत हैं..यमराज से बचा कर ले आए मुझे!
माँ! भूक लगी हैं माँ..."
सुरेश की बात सुन सभी की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे और चेहरे पर मुस्कान चमकने लगी मानों रिमझिम बारिश के बिच सुनहरी धूप में निकला इंद्रधनुष!
हाथ पैर धो कर भैया के आते ही सभी गोलाकार बैठ गए! बिच में रसोई हम सब टूट पड़े 'वणज' पर... साथ में राम खिचड़ी, आलु की सब्जी और गरमागरम पूड़ी!
संध्या समय में माँ ने देहरी पर दीया जलाया और चाँदी की थाल में कुंकुम, अक्षत, रोली, राखी, लुम्बा ले हमने राखी उत्सव मनाना आरम्भ किया! मिट्टी के दीये की लौ में सब के चेहरे दमक रहे थे और कलाईयों पर राखियाँ चमक रही थी और भाभी के माथे पर सुहाग का सिंदूर और कलाई पैर मोतियन का लुम्बा...
घर का कोना-कोना अब मोगरे की महक से सुरभित था और उल्हासित मन भावविभोर हो रच्चनहारे का शुक्रिया अदा कर रहे थे .. बहना के लिए भाई के कुशल-मंगल से बड़ा राखी का उपहार क्या हो सकता था भला?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |