ज़िन्दगी की जंग में हार मत,प्रतिकार कर!
गलतियों से सबक ले,
मंज़िल की राह प्रशस्त कर!
जुझारू बन!
गुलामी से इंकार कर!
ज़िन्दगी से समझौता भले ही कर,
ज़मीर से समझौता न कर!
पथरीली पगदंडी पर आगे बढ़,
कोशिशों को नई ऊर्जा से भर!
ज़िन्दगी की किताब के पृष्ठ,
सफलता की स्याही से रंगीन कर!
राह में आई मुश्किलों की कर रेकी ,
सुन जन-जन की, कर मन की!
अपनी गुस्ताखियों के गुलदस्ते,
कहकहों संग स्वीकार कर!
ख़्वाबों के खूबसूरत खगों को,
विस्तीर्ण, विस्तृत, वाहिद व्योम दो!
चैतन्य-ज्वाला प्रज्वलित करो,
मनुज जीवन लक्ष्य निर्धारित करो!
अनवरत प्रयासों के बलबूते,
जीत की ओर प्रस्थान करों
अवरोधों की चट्टानों को,
अटल इरादों से चूर-चूर करों!
जीत में भी हार का भान रख,
वसंत में मुरझाई साँझ का ध्यान रख!
बुलबुला जल का, जल में समायेगा,
क्षणिक जीवन फलसफ़ा समझायेगा!
अवरोधों की दौड़ ज़िन्दगी, हार मत,
मन के हारे हार है, हार मत, प्रतिकार कर!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।