ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ६४
भाग ६४

आबा ने फ़ोन कर जानकी जी को कह दिया था कि वह 'फॉरच्युनर' भेज रहे है। सुबह ग्यारह बजे प्रार्थना सभा रखी हुई है, सभी जल्दी निकल कर सुबह नौ बजे तक पहुँच जाना। वज्र से भी आबा ने बात की। उसे भी उन्होंने समझाया और खुद की तबियत का खयाल रखने को कहा। उसे खुश देख कर ही आजोबा की आत्मा को शान्ति मिलेगी यह बात उन्होंने उसके दिमाग़ में बैठा दी थी। वज्र भी कोई छोटा बच्चा तो था नहीं। वह भी समझ चूका था कि होनी को वह टाल नहीं सकता मगर अपने भविष्य का निर्माण वह आजोबा के आदर्शोपर चल कर कर सकता है ! उसने मन में ठान ली थी कि वह ऐसा कुछ करेगा कि उसके जाने के बाद भी लोग उसे याद करेंगे! आजोबा कों श्रद्धांजलि स्वरुप वज्र ने यहीं संकल्प कर लिया था। 

आज विभा का अंतिम मैच था । वह भी कुछ-कुछ हताश हो चुकी थी। वज्र ने वैदेही को कहा, हम जाएंगे विभा का हौसला बढ़ाने। मेरे जाने न जाने से आजोबा तो फिर नहीं आयेंगे लेकिन हमारी हौसलाअफजाई से अगर विभा का चयन हो जाता हैं तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। यहीं आजोबा को श्रद्धांजलि होगी। वैदेही उसकी ऒर देखने लगी। कितनी सुलझी हुई, परिपक्व सोच हैं वज्र की... होगी भी क्यों नहीं? यह उसे आजोबा ही तो विरासत में दे गए थे।

आजोबा दुनिया से अलविदा कह कर जाते-जाते नेत्रदान कर गए थे। आबा ने उनकी अंतिम इच्छा पूरी करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। आजोबा का अंगदान भले ही न हो पाया लेकिन वह एक गरीब को नेत्रदान दे कर प्रकृति के सभी रंगों को खुली आँखों से देखने का सुनहरा मौका जरूर दे गए थे। 

ऊपरवाला भी कितना दयालु हैं! जैसे एक वृक्ष का हर अंग किसी न किसी रूप में काम आता हैं वैसे ही मानव शरीर भी काम आ सकता हैं औरों के लिए जिन्दा या मुर्दा भी। बस! जरुरत हैं आधुनिक, व्यवहारिक सोच की। मृत्यु के बाद शरीर चिता में जल कर राख होने से बेहतर हैं कि वह किसी और के काम आएं! किसी के दुःख-दर्द-कमी को दूर कर सकें !

आबा तो उनका ही अंश थे। कैसे भूल पाते उनके संस्कार? धर्म की नींव ही तो मानवता हैं। सच्ची श्रद्धांजलि तो वही होगी कि उनके आदर्शो पर चले और उन्हीं सिद्धांतों पर अमल कर रहे थे आबा और उनका परिवार। ज़िन्दगी सिर्फ अपने लिए नहीं औरों की बेहतरी के लिए भी जी रहे थे आबा। उन्हें विश्वास था कि उनकी यहीं भलाई उनके बुरे वक़्त को सहजता से पार करने का उन्हें हौसला देती हैं, मार्ग दिखाती हैं। आखिर चित्रगुप्त के लेखा-जोखा में घालमेल की गुंजाइश ही कहाँ होती हैं? सब कुछ साफ़-सुथरा और पारदर्शी। 

विभा आराम कर रही थी। वह आजकल जल्दी चिंतामग्न हो जाती थी। उसने अब योग का सहारा लेना ठीक समझा था। सुबह जल्दी उठ कर वह रोज ध्यान करने लगी थी। निजी जीवन की एकाग्रता के लिए भी उसे साधना की सख्त जरुरत थी। ज़िन्दगी जब भी पटरी पर लौटने का प्रयास करती, कुछ न कुछ अवरोध सूरसा से मुँह फाडे उसे निगलने को, चुनौती देने को खड़े हो जाते लेकिन वह भी एक चोटी की खिलाडिन थी। उसकी संघर्षक्षमता को आंकने में ऊपरवाला भी शायद गच्चा खा गया था। पल भर अवसाद में डूबी विभा उठकर अगले ही पल खड़ी हो जाती और चुनौतियों को खुद ही ललकरती, चुनौती देती। आज भी वहीं किया था विभा ने! 

विभा और वीणा की जोड़ी नई-नई थी। वीणा भले ही कुछ कमजोर थी शॉट्स उठाने में मगर यहीं तो खुबी हैं महिला युगल स्पर्धा की कि कौन बेहतर तरीके से एक-दूसरे की कमियों को ढँक कर खेलने में सफलता की ऒर बढ़ता हैं। विभा इस बात में निष्णात थी। एक-दूसरे का पूरक बन कर मैच जीता जा सकता हैं यह वह बखूबी जानती थी।

मैच के कुछ समय पहले उसे कोर्ट में पहुंचना था। यश उसके साथ जानेवाला था और वज्र और वैदेही बाद में! विभा ने आज नाश्ता और भोजन हल्का-फुल्का किया था। खेल सिर्फ शरीर से ही नहीं स्वस्थ मन और उच्च तकनीक से भी जीता जाता हैं यह वह जानती थी। इसीलिए शरीर के साथ-साथ उसने मन को भी तरोताज़ा रखने की भरसक कोशिश की! 

चार बजकर पैतालिस मिनट पर वह और यश बैडमिंटन कोर्ट की ऒर चल पड़े। कुछ 'वार्म-अप' के बाद विभा आराम करने लगी। वीणा भी पहुँच चूकी थी। यश और नितीन सर ने दोनों से बातें की ताकि वो तनावरहित हो कर अपना नैसर्गिक खेल खेल सकें। 

सही समय पर उन्हें खेलने के लिए आमंत्रित किया गया। दोनों कोर्ट पर हाजिर हो गई। सामने की प्रतिद्वंदी भी अनुभवी और शीर्ष पर खेल चुकी थी। चुनौती आसान नहीं थी लेकिन खेल-प्रेमियों के लिए यह खेल का आनन्द लेने का सुनहरा मौका था। जब दोनों तरफ की टीमें मंझी हुई हो तो खेल का मज़ा ही कुछ और होता हैं।

अंपायर ने खेल की शुरुआत की और विभा ने सर्विस चुनी। पहली ही ऊँची सर्विस पर सामनेवाली खिलाडी ने ऐसा शॉट मारा कि दोनों देखती ही रह गई। दूसरी सर्विस पर भी कोई पॉइंट उन्हें नहीं मिला। दोनों तरफ से जोरदार चेअरिंग शुरू थी। यश ने विभा को नेट के समानांतर तिरछी सर्विस का इशारा किया और विभा का यह दाँव सही साबित हुआ। वह समझ गई कि प्रतिद्वंदी को शॉट मारने का मौका नहीं देना हैं बल्कि नेट के करीब यहाँ-वहाँ दौडाना हैं। उसने वीणा को भी यहीं बात समझाई। पहला गेम विभा की टीम ने जीत लिया लेकीन दूसरा गेम बहुत कम अन्तर से प्रतिद्वंदी टीम ने जीत लिया। 

अब अंतिम मौका था विभा और वीणा के लिए। चारों जी-जान से खेल रही थी। आखिर यह देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका था। विभा ने आदिशक्ति माँ भवानी को याद किया और उतर गई कोर्ट पर वीणा के साथ अंतिम संघर्ष के लिए। दोनों में जबरदस्त टक्कर थी। एक-एक अंक के लिए लम्बी-लम्बी रैलियां चल रही थी। फ़ासला बहुत कम था लेकिन विभा का अनुभव यहाँ अपना जलवा दिखा गया। अपनी नेट पर समानांतर सर्विस और प्लेसिंग से उसने अंतिम दो अंक ले कर गेम अपनि टीम के नाम कर दिया।

यश और नितीन सर के समय-समय पर दिए गएं संकेत, सूचनाएं तथा वज्र, वैदेही तथा यश का चेअरिंग अपना कमाल दिखा चुका था। अब जश्न मनाने का समय था। सब ने विभा और वीणा को भविष्य के शुभकामनाएं दी और नितीन सर ने दोनों का अभिनन्दन कर पीठ थपथपाई।महाविद्यालय के लिए यह गर्व की बात थी कि उनके विद्यार्थी देश के लिए खेलने के लिए चयनित हुएं हैं।
नितीन सर की मेहनत रंग लाई थी। खिलाडियों के तो क्या कहने! उनका जज़्बा, हिम्मत, लगन और जीत के लिए अथक प्रयास का कोई सानी नहीं था। आखिर समर्पण और साधना के बिना लक्ष्य हासिल होता हैं भला?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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