"दिल"

"दिल"
"दिल"
जब भी इस शब्द को सुनते हैं।।।  हमारे दिल में!!! हां हां !!!! दिल में ही।।।। 
हज़ारो सवाल आ जाते हैं।।।। 
इस चमचमाती रौशनी मैं इस चमकीली दुनिया में 
एक मुसाफिर ने अपना दिल खोल के रखा हैं 
लिए दिल अपना ठेले पर बेचने वो निकला बाज़ार में हैं 
अरे गरीब !!!!
अरे बेपर्वाह !!!!
कुछ तो ख्याल कर !!!
इस दिल में सजाए तूने हज़ार ख्वाब हैं।।।।।  फिर क्यों बेचने निकला हैं इसको।।।।। 
क्या कोई खरीदार भी हैं।।।।।। 
अरे ये बेगार्दो की दुनिया हैं !!!
यहाँ कपडे के दिल बिकते हैं !!!!
तू कहा ये अपना सचमुच का दिल ले चला हैं !!!!
अरे ये लोग कहा हीरे को पछानेंगे।।।। 
इन्हे तो सस्ते की आदत हैं।।।। 
जिसे ये जब चाहे उधेड़ दे ,
बच्चा रोये तो सील दे।।।। 
इन्हे क्या मालुम क्या होता हैं दिल जो अपने दिलो में इतने पत्थर ले घूम रहे हैं 
इन्हे क्या मालूम मासूमियत क्या होती हैं 
अरे इन्हे क्या मालुम दिल्लगी क्या होती हैं 
अरे ये कोई फ़क़ीर नहीं 
ये तो गरीब हैं 
इन्हे क्या मालुम दिल क्या होता हैं।।।। 
मुर्दो के बाज़ार में भला दिल कोई बेचता हैं।।।।। 
जा जा घर जा अपने बहोत देर हो चुकी हैं।।। 
आज तुझे भूका ही सोना पड़ेगा।।। 
क्योंकि इस दुनिया में दिल का ग्राहक तुजे फिर नहीं मिलेगा।।।।।। 


द्वारा Yatharth Puri
Shared21 Jan 2026
Start 20 Jan 2026
End 20 Jan 2031
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