आत्मसाहस

खिलखिलाता हुआ भानुमती का चेहरा पिछले कई दिनों से उदास था। हमेशा दूसरों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के लिए न जाने क्या- क्या नहीं करती? और आज उसे जब सबके साथ की जरूरत थी तो संभालने वाला कोई नहीं था शायद इसकी जिम्मेदार वह खुद को ही समझती। अपनी मन की तो भी उसे आज तकलीफ हो रही थी, गलत उम्र में जो कुछ उससे हुआ था उसी का यह परिणाम था। सब रिश्तेदार, परिवार और दोस्तों ने मना किया था किन्तु उसे जो परदेस जाने का भूत मन पर सवार था इसके आगे वह कुछ देख न सकी। घर - परिवार वालों से लड़- झगड़कर, दोस्ती का  साथ छोड़ सबके विरूद्ध जाकर संतोष से शादी कर ली। 

उन दोनों में शुरू- शुरू में सब अच्छा रहा लेकिन जैसे ही शादी को तीन- चार साल हो गए पता चला कि संतोष ने जो वादें, कसमें पहले करें थे वह सिर्फ झूठ और जूमला था। कहाँ वो संतोष की ख्वाहिशों पर जिंदगी गुजारना चाहती और वही उसपर आरोप लगाने लगा। हर वक़्त भानुमती को कोसता और खरी - खोटी सुनाता , संतोष यह कहकर ताना कसता कि "तुम्हारे कारण मेरा जीवन बर्बाद हो गया, तुमसे शादी कर मैंने खुद को बर्बाद कर डाला न जाने किस घड़ी तुमसे मुलाकात हुई। " भानुमती यह रोज के ताने सुनकर अंदर ही अंदर सिमटने लगी। रोष , द्वेष करें भी तो करें किसका, जब कुछ बोलने के लिए जुबान खोलती सिवाय मार के उसे कुछ नहीं मिलता। उसके अपनों से तो मिलने की हिम्मत ही नहीं बची थी, उसे तो पता भी नहीं कि मेरे इस फैसले के कारण परिजनों ने सूतक निकाल लिया ताकि ऐसा दुस्साहस परिवार में अन्य कोई न करे। इस बात का पता भानुमती को तब मालूम हुआ जब उसकी एक खास सहेली ने घर में हार पहनी हुई भानु की तस्वीर देखी थी। प्यार करने की इतनी बड़ी सजा मिली कि वह कभी घर भी नहीं जा सकती, पता नहीं था कि मेरा ये विश्वास मुझे ही मृत्यु के द्वार लेकर आया है। बहुत कुछ सोचा लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती थी, मन में बहुत बार ख्याल आये किन्तु वह स्वयं को खत्म नहीं कर सकी, इतनी हिम्मत नहीं रही उसमें । 

कॉलेज के दिनों ही उसकी मुलाकात संतोष से हुई थी, आकर्षक व्यक्तित्व का धनी वो था ही उसके साथ- साथ पढ़ाई में भी तेज था। वह हमेशा क्लास में आखिरी बेंच पर बैठता ताकि वह खुद को कभी किसी के साथ शेयर नहीं करता किन्तु भला बात कैसे हुई जो संतोष को भानुमती के साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा। भानुमती भी उससे बातें कर अधिक प्रफुल्लित रहने लगी, दोनों ही अपने मन की हर एक बात एक दूसरे से सांझा करने लगे और दोनों में एक अच्छी बॉंडिंग होने लगी थी। भानुमती ने जान लिया था कि संतोष का सपना विदेश में सेटल होने का है तो वह उससे और करीब जाने लगी ताकि उसका तो बचपन से सपना था कि मुझे परदेस ही जाना है। उन दिनों छुट्टियां चल रही थी तो भानुमती के लिए रिश्ते आने लगे थे तो उसने अपने पिता से बात की तो पता चला कि पापा सब जान चुके थे और वह यह भी जान गए कि संतोष अपनी जाति का लड़का नहीं जिस कारण भानुमती के लिए लड़के देखने का कार्यक्रम तेज गति से चलने लगा। प्रेम की अंधी भानुमती कुछ समझ न सकीं और स्वयं के पास जो था उसे समेटकर ही संतोष के पास आ गयी। संतोष अपने घर भानुमती को देखकर अचंभित था क्योंकि इतना बड़ा निर्णय वह ले सकती है ऐसा विश्वास उसे नहीं था। 

भानु, तुम इस वक्त और यह सब सामान बात क्या है? .. संतोष के इस सवाल का जवाब साफ - साफ दिखाई दे रहा था। लेकिन उसे अपने प्यार पर जो विश्वास था वह और मजबूत करना था, शायद उसके प्यार में वह साहस नहीं जो उसने कभी किस्से कहानियों में पढ़ा था। 

भानु को समझाना बेकार था, वह इतनी हट्टी और स्वच्छंद स्वभाव की जो ठहरी। संतोष ने भी उसे कुछ नहीं कहा, उसके प्रति लगाव कुछ अधिक होने के कारण भानु को अस्वीकार करने की हिम्मत न हुई। संतोष के परिजन भी उसकी पसंद पर नाज करते। संतोष को जो आशा थी उससे कहीं बेहतर पत्नी मिलने के कारण उसकी खुशी में चार चाँद लग गए। कहते हैं ना समय का पहिया जब घूमता है तो हमें हकीकत से एकबार जरूर सामना करना होता है, कुछ ऐसा ही मोड़ संतोष की किस्मत में आया और सबकुछ एक क्षण में बर्बाद हो गया। 

संतोष ने अपने अजीज दोस्त से सलाह - मशवरा करने के बाद ही किसी फायनान्स कंपनी में पैसे लगाये। सोचा था , इस कंपनी से कुछ रकम कमाकर दुबई चला जाऊंगा और एक अच्छी लाइफ गुजारूंगा। नियति को कुछ और ही मंजूर था, एक दिन खबर मिली की कंपनी का दिवाला निकल गया तो बस क्या था? संतोष जैसे बहुत से लोगों के रूपये तो डूबे ही उसके साथ जो कुछ था वह भी चला गया। संतोष की सारी उम्मीदें टूट सी गयी, जो कुछ था वह भी नहीं रहा। जिस कारण वह अशांत हो गया और बरबस सारा गुस्सा भानु पर उतार देता, भानु से कुछ कहते न बनता। जिस आत्मविश्वास के साथ वह घर से भागी थी, अब वो सिवाय अपराध के कुछ न रहा। वह न घर की रही न घाट की, उसमें तो अब साहस भी नहीं रहा कि घर छोड़कर कहीं दूर निकल जाये। चुपचाप मूर्ति की तरह बैठी रहती, ना कुछ कहती ना प्रतिउत्तर देती अब सिवा मार के उसके हिस्से कुछ था तो वह उसका बेटे का प्यार जो अभी दो - तीन महीने का ही था। संतोष तो उसे अपशकुनी समझता, उसे प्यार से निहारता भी नहीं उसके साथ ऐसा बर्ताव करता मानो उसके जन्म होने के कारण ही उसके रूपये डूबे हो। 

प्रेम की परिणति को भानु समझ न सकी। जहाँ उसके पास सब आ सकता था वही एक दिखावा, आकर्षण और लालच के कारण स्वयं की यह दशा कर दी। बच्चे की खिली हुई मुस्कान देखकर ही वह अबतक जीवित थी, किंतु उस दिन संतोष नशे में आकर शोर- शराबे के साथ जब मासूम पर हाथ उठाने के लिए आगे बढ़ा तो भानु ने उसका प्रतिरोध किया जिस वजह से संतोष ने देर रात दोनों माँ- बेटे को घर से बाहर निकाल दिया। इस घटना से भानु की ऑंखों के सामने पिता के वह शब्द घूमने लगे जिसकी अहमियत उसे हकीकत से रूबरू होकर ही प्राप्त हुई। भानु के लिए तो स्वयं के हक का ऐसा कुछ बचा न था जिसे वह मेरी चीज कह सकती, किसी लड़की के लिए उसका ससुराल ही मंदिर के समान होता है जो उसे लक्ष्मी का स्थान दिलाता है मगर भानु के लिए तो ससुराल उस मिट्टी के लोंदे के समान था जो पानी के तेज बहाव के साथ ही बह जाता है। 

भानु स्वयं से कहती कि बस अब बहुत हो चुका, मैं हार गयी। इन्सान हूँ, भावनाएँ है जिसे वह न जाने कब का खत्म कर चुकीं थी । एक क्षण सोचती, अगले ही पल रवि का ध्यान आ जाता जो एक ही उसकी आशा बनी। रवि के चेहरे पर सदैव मुस्कुराहट देखने हेतु वह हमेशा दौड़ती भागती रही। नियति का खेल कितना अद्वितीय है, भानु ने स्वयं की मेहनत से मुंबई जैसे महानगर में शिलाई का काम शुरू किया और देखते- देखते ही उसने अपना रूप इतना बड़ा कर लिया कि भानु दूसरों को रोजगार देने के लिए सक्षम हो गयी। वक्त बदलते ही लोग कैसे बदल जाते हैं न जब भानु को अपने लोगों का साथ चाहिए था, उस वक्त वह अकेली थी और जब उसके पास सब तरह के ऐशोआराम है तो लोग उसके पास आते रहते। इन सोलह सालों में भानु ने हर तरह के उतार- चढ़ाव देखे, बहुत सी ऐसी समस्याओं का सामना किया जिसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। इन सबका यही नतीजा था कि वह संतोष जिसने रात के समय घर से बेदखल कर दिया और उस पिता का जिसने उसे जीते जी मृत घोषित कर दिया था, उन्हीं लोगों की वह आजकल सेवा करने में अपने जीवन की सार्थकता समझती है। इसी स्वभाव, धैर्य और साहस के कारण भानु को एक प्रतिष्ठित एवं योद्धा का सम्मान प्राप्त हुआ जो कि बिरादरी तथा परिजन और ग्रामस्थों ने दिया। 

भानु को समझ आ गया कि स्वयं के सपनों के लिए खुद लड़ना पड़ता है, औरों के भरोसे पर तो हम भविष्य की हसीन कल्पनाएँ तो कर लेते हैं मगर अपने सपनों को पंख हमेशा स्वयं ही दे सकते हैं। किस्मत के भरोसे और अपने चहेते तो बस मन को साहस देते हैं, परंतु जब तक हम उसके अंदर छलांग नहीं मारते तब तक कुछ नहीं हो सकता। भानु ने भले लाख गलतियां की हो मगर आज उसके पास वो सबकुछ था जिससे वह सुख का उपभोग कर सकती थी। 


द्वारा Manthan Deore
Shared08 Jul 2025
Start 08 Jul 2025
End 08 Jul 2030
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कहानी! सुन्दर प्रस्तुतिकरण! बधाई मंथनजी!🙏🙏❤️🙏
  • लाजवाब ❤️🙏❤️🙏❤️
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!