ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग १२
भाग १२

दीवाली की छुट्टियाँ अब ख़त्म होने को थी! वैदेही ने कुछ ख़रीदारी करने का मन बना लिया था! सुबह से वह दादर जाने का प्लान बना रही थी लेकिन माँ भीड़ में उसे ले जाने से कतरा रही थी.. अंत में उसने ऑनलाइन ख़रीदारी करने का निर्णय लिया और सरफिंग करने में व्यस्त हो गई।
वह चाहती थी कुछ ऐसे परिधान जो ज्यादा तंग न हो और सौ प्रतिशत कॉटन से बने हो...रंग खिले-खिले हो जो मन में उजास भर दे! वह चाहती थी अपने इर्द-गिर्द सकारात्मकता का जाल बुनना ताकि कोई नकारात्मक विचार मन में प्रवेश ही न कर पाएं... उसने कुछ फूल- पत्तियों के डिज़ाइनर कपडे चुने, कुछ टी-शर्ट्स तथा दो जींस...एक नई पर्स भी आर्डर कर दी... चीजें ज्यादा महँगी भी नहीं और ऐसी सस्ती भी नहीं  कि 'धोएँ और रोएँ '... वैसे 'स्टैण्डर्ड साइज' में बहुत सारे पर्याय मिल जाते है 'युवा ब्रिगेड' को ऑनलाइन शॉपिंग में..
वैदेही को वैसे तो छोटी-छोटी दुकानों में जा कर, स्वयं सभी चीजों को देख कर ख़रीदारी करने में मजा आता था.. वो जानती थी इन ऑनलाइन बड़े-बड़े ब्रांड की वजह से छोटे-छोटे व्यापारियों का अस्तित्व ही खतरे में आ गया हैं लेकिन यह भी हकीकत हैं कि समंदर में बड़ी-बड़ी मछलियों के साथ भी छोटी-छोटी मछलियाँ अपना अस्तित्व बनाये रखती हैं.. लेकिन उन्हें बेशक़ बहुत संघर्ष करना पड़ता हैं।

ऑनलाइन भुगतान कर वैदेही माँ को मदद करने रसोई में चली गई... कुछ समय बीता और फ़ोन पर धुन बजने लगी... "हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िन्दगी..." उसने फ़ोन उठाया! वज्र की माँ का फ़ोन था! उसने माँ के हाथ में फ़ोन दिया.. माँ अपना फ़ोन साइलेंट मोड पर रख कर  आ गई थी रसोई में।

वज्र के दादा, दादी और माँ कल सुबह पूना अपने गाँव जाने वाले थे.. वो आज चार बजे मिलने आने वाले थे माँ और वैदेही को...
दोनों ने जल्दी-जल्दी भोजन कर सारा काम निपट लिया..
दिवाणखाने के सोफा के कवर बदले और छोटे-छोटे तकियों के खोल बदली कर उन्हें सोफा पर सजा कर रक्खा ! वैदेही ने आँगन से कुछ फूल-पत्तियां-बालियाँ लाकर शीशे के फूलदान में पानी डाल कर उन्हें नई शैली में सुशोभित किया और टीपॉय के मध्य में रख दिया ...खिड़कियों के परदों को करीने से बांधा और फिर कुछ समय आराम करने लगी।

नित नए तनाव, चिंता, परेशानियों ने वैदेही की माँ जानकी को पैतालिस की उम्र में ही पचपन का बना दिया था...माँ का दिन तो काम में गुजर जाता लेकिन उसकी रात बड़ी मुश्किल से गुजरती... जरासी आँख लगी नहीं कि अतीत की यादें हौले से मन के द्वार खटखटाने लगती और ले जाती उसे  मीलों दूर भूतकाल की तन्हा गुफ़ाओं में.. जहाँ अँधेरा ही अँधेरा नज़र आता! बरसों बाद भी यहीं हाल था जानकी का।
पीहर के पड़ोस के लोगों के आने की ख़बर से ही उसका मन क्षितिज रेखा को छूँ कर अतीत के सुनहरे पलों के पीछे भागने लगा... 
जानकी और श्री...'लव बर्ड्स'! उन्होंने प्रेम विवाह किया था! महीनों परिवार से लड़-झगड़ कर, ज़िद कर एक-दूजे के हो गए थे वो! कितनी खुश थी जानकी मानों जीवन का सबसे अनमोल उपहार पा लिया था उसने! शादी के बाद के दो-तीन साल कब फुर्र हुए...पता ही नहीं चला जानकी को! 
स्त्री जब जीवन में अपना पहला प्यार पाने में कामयाब हो जाती है, उसका मनपसंद राजकुमार जब उसका जीवन साथी बन कर बड़े आत्माविश्वास से उसका हाथ थाम कर अग्नि साक्षी से सात फेरें लेता है तो उस स्त्री के लिए तो मधुचंन्द्रमा की रात आकाश में उमड़ी ग्रह-नक्षत्र की बारात ही होगी न।
सब कुछ अच्छा, मनचाहा होते देख भगवान भी शायद सोचने लगता है , "अरे! यह जोड़ा तो मुझे विस्मृति के अंधेरों में धकेल देंगा .. फिर क्यों याद करेगी यह दो हंसों की जोड़ी मुझे " और अपनी व्यूह रचना में मग्न हो जाता है शायद...
जानकी श्री की हो चुकी थी मानों समंदर में समाई पावन सरिता! वक़्त बाज़ के पँख लगा कर उड़ रहा था.. वैदेही बड़ी हो रही थी.. पिता की बहादूरी तथा जाँबाजी पर बेटी को बहुत गर्व था.. एकलौती संतान वह भी लक्ष्मी की प्रतिमूर्ति... वैसे भी कहते है पहली संतान पर पिता का प्यार खूब बरसता है... मेधावी, सुन्दर, मितभाषी वैदेही अपनी एक मुस्कुराहट से हर शख्श का दिल जितने का हुनर जानती थी।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी और वैदेही ने दरवाजा खोला! 
वज्र की माँ प्रतिभा जी, दादी-दादा जी द्वार पर खड़े थे.. जानकी झट से आई और धीरे-धीरे सभी को अंदर सोफे पर बैठा कर उसने तीनों को साष्टांग दंडवत किया.. पानी लेकर आई वैदेही ने भी सबको प्रणाम किया... और माँ के पास खड़ी हो गई।
पुरानी पीढ़ी का जलवा ही कुछ अद्भुत था! दोनों अस्सी पार के थे लेकिन आज भी रीढ़ की हड्डी में भरपूर दम था...घर का असली घी, जैविक खेती से निपजे धान की रोटी, खुद के घर-आँगन में उगी सब्जी-फल खा कर बड़ी हुई यह पीढ़ी आज के युवाओं को शर्मिंदा कर कटघरे में खड़ी कर रही थी! खूब खून-पसीना बहाकर अर्जित यह निरोगी काया, सरल, साफ़ दिल और खुली हवा में पली इस पीढ़ी की बराबरी आज का युवा कैसे कर पायेगा? 
माँ ने वैदेही को नाश्ता लाने के लिए कहा और वैदेही नाश्ते की प्लेटे सजा कर ले आई! माँ-बेटी की पुरानी यादें ताज़ा हो गई थी।
नई और पुरानी यादें हाथ में हाथ डाल कर इतरा रही थी तभी दादा जी बोल पड़े... वैदेही! कॉलेज कधी शुरू होतयं? वैदेही कुछ बोलती उसके पहले ही दादी बोल पड़ी... "पोरी! आमचे एक काम करशील का गं?" हमें अंगदान आणि नेत्रदान करना हैं..हमारे फॉर्म भरोगी क्या वैदेही ? 
एक मिनिट के लिए वैदेही सुन्न हो गई! इन्हें किसने बताया अंगदान के बारे में? कहीं माँ ने तो.. तभी दादी बोल पड़ी..."अन्नपूर्णा बोलली मला...वैदेही! करशील न माझे काम?" दादी उठ कर वैदेही के पास आकर उसके सिर पर हाथ घुमाने लगी... दादा जी भी उठे और वैदेही का हाथ हाथ में ले इसे आशाभरी नज़रों से देखने लगे.. वज्र की माँ खामोश बूत सी खड़ी थी.. उसकी आँखों से आँसू बहने लगे... "पोरी! माझं पोर वाचलं... पण अशी किती तरी... "और वह खुद को संभाल नहीं पाई.. आंसुओं ने फिर एक बार दगा दे दिया था।

जानकी और वैदेही दो पल के लिए नि:शब्द हो गई... वह लैपटॉप बाहर लेकर आई और कुछ ही समय में उसने तीनों के ऑनलाइन फॉर्म्स भर दिए...नेत्रदान तथा अंगदानकर्ता के कार्ड की प्रिंट निकाल कर उन्हें दी और नीचे हस्ताक्षर करने को कहा।

दादा-दादी ने उसे छप्पर फाड़ कर आशीर्वाद दिएँ.. वैदेही ने उन्हें समझाया कि इसके बारे में सब से पहले आपके निकटवर्तियों को जानकारी देना आवश्यक हैं.. क्योंकि आप के 'ब्रेन डेड' होने की स्थिति में जल्द से जल्द अस्पताल को सूचित करना जरुरी हैं... उस वक़्त खुद को संभाल कर सही वक़्त पर सही लोगों को सूचना देने पर कई लोगों को नई ज़िन्दगी दी जा सकती हैं आजोबा (दादाजी)।

जानकी स्तब्ध थी... इस उम्र में इतनी सुलझी सोच! पुरानी परम्परा और रीति-रीवाजों को तोड़ कर निर्णय लेने का जिगरा... वह उनके सामने नतमस्तक हो गई!
ज़िन्दगी को जीने का इन बूढ़ी हड्डियों का अंदाज उसे भा गया! कितनी सुन्दर, परिपक्व सोच...दुनिया में आए हैं तो कुछ ऐसा कर कर जाएं जिससे हमें सुकून-शान्ति मिले, हमारा मनुज जन्म सफल हो...एक ही अडचन हैं...यह हम स्वयं नहीं कर सकते..इसमें अपनों का समयोचित, समयानुरूप सहयोग आवश्यक हैं।

वैदेही खुद को आज भाग्यशाली समझ रही थी! धर्म का मर्म समझना-समझाना अलग बात हैं और धर्म का मर्म समझकर उस पर चलना अलग बात हैं... आज उसके दिल में आबा के परिवार के प्रति सम्मान और बढ़ गया था! वज्र के भाग्य पर उसे ईर्ष्या हो रही थी...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र 

शेष भाग अगले अंक में...


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