जैसे-तैसे कटे जिंदगी,
उन धन-हीन गरीबों की।
मिलती मुश्किल से दो रोटी,
फूटे भाग नसीबों की।।
करते नेता मौज मस्तियां,
लगी बोली जमीरों की।
लूट रहा ये देश देख लो,
टोली बनी अमीरो की।।
देश चाहे गर्त में जाए,
चिंता कब उनको होती?
वे तो केवल करें सीयासत,
मुद्दो पे सेंके रोटी।।
क्या करेंगे नेक कुछ नेता,
कैसे निपटें चोरों से।
कैसे रोकें कैसे टोके,
आकुल रिश्वत खोरों से।।
स्वरचित:अशोक दोशी