खुद की खोज कर...

अमावस के धुप्प अंधेरों में चाँद का दीदार कर,

कोशिशों के बल पर अंतरिक्ष में उड़ान भर!

जीवन-प्रमाण खोजने मंगल की ओर कुच कर!

तन्हाईयों में खुद को जानने का अट्टाहास कर!

 

कोयले की खदान से हीरा ढूंढ लाएँ हैं हम!

चाँद को माँ भारती की राखी बाँध आएं हम!

महामारी के मुश्किल दौर में विश्व-सम्बल बने हम!

वक़्त के भाल पर चन्दन तिलक कर आएं हम!

 

क्यों ढूंढ़ न पाएँ आज तक अपने हुनर को हम?

छुपे उम्मीदों के बीज उर्वरा कुक्षी में हम!

क्यों वाकीब नहीं काबिलियत से स्वयं की हम?

क्यों दफ़न कर स्वयं को चढ़ाते रहे फूल हम!

 

स्वरचित तथा मौलिक,

द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

 

 

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